Saturday, March 27, 2010

तुम्ही निकले ...........

सुख चैन छीन कर कहते हो 
सजा तो नहीं है
जलाकर कपूर कहते हो 
राख तो नहीं है 
जाऊं भी तुम्हे छोड़ कर तो कहाँ जाऊं 
मंदिर, मस्जिद और भगवान भी तुम्ही निकले 

अधर चुम्बन देकर कहते हो 
बेशर्मी तो नहीं है 
तीर धनुष से छोड़ कर कहते हो
मृग तो नहीं है 
घायल होने से रोकें तो कैसे रोकें दिल को 
आखेट, आखेटक और सारथी भी तुम्ही निकले 

हाथ दिल पर रखकर कहते हो 
धड़कन तो नहीं है 
भाव इश्क का लगा कर कहते हो
सस्ता तो नहीं है 
बिकने से रोकें दिल को तो कैसे रोंकें
दूकान, मालिक और खरीदार भी तुम्ही निकले

Thursday, March 25, 2010

धीरे-धीरे चल....जिंदगी को जी......

भाग रहा है इन्सान 
दौड़ रहा है अनचाहे सपनों के सड़क पर 
कभी दायें तो कभी बायें मुड़ता
फिर भी नहीं पहुँचता मंजिल पर 
सबको पीछे छोड़ने कि ठसक 
सबसे आगे दिखने कि जिद
में क्यों है तैयार बिकने को 
खो गाया है तू कहीं इन्सान
क्या हो गया है तुझे!! ....
खोज रहा है गेहूं भूसे में
पानी में चला रहा है तलवार
थोडा तो बदल गाया इन्सान
वो दिन ना आये जब तू थक जाये 
रिश्ते भी दामन छोड़ दें....
अकेला पड़ जाये और रास्ते भी बंद हों 
मन को थाम ले अभी भी है समय 
धीरे-धीरे चल
जिंदगी को जी.....

Saturday, March 20, 2010

नेता तुम लूट लो............

आम आदमी की आस 
बड़े वादों का झूठा विस्वास 
भावनाओ का ब्रत उपवास 
लूट लो दोनों हाथों से लूट लो 
नेता तुम लूट लो............
चुनाव आते हैं  बार-बार 
नयी आस और उम्मीद के साथ 
कर दिए जाते हैं फिर वही वादे 
जिनपर इरादे थे सफ़ेद और सादे 
क्यों करते हो वादे 
जो करना है कर लो 
नेता तुम लूट लो............
सम्माननीय भारतीय सविंधान
लोकतंत्र  और उसकी लाज की 
बारी-बारी से संसद में लगाओ बोली 
आज ही मोल कर खरीद लो
नेता तुम लूट लो............






 

Wednesday, March 17, 2010

"युवाओं से है मेरी पुकार...सरदार भगत सिंह की कुछ पक्तियों से...."

आज आप को मैं कुछ उन पक्तियों से परिचय कराता हूँ जब सरदार भगत सिंह जेल में अपनी मंगेतर के याद में गाया करते थे.

आजीवन तेरे फिराक जुदाई विछोट्र,
विरह, नामिलन के कारण 
दिल का शीशा इतना कमजोर हो गया कि 
किसी फूल पत्ती या पराग कि चोट से टूट ना जाये, 
इसलिए ये फूल पत्ती और पराग धीरे-धीरे धीमे-धीमे चढ़ा. 

इन पक्तिओं को पढने के बाद मैं लिखे बिना रुक ना पाया 

आजीवन जिसने सहा फिराक जुदाई विछोट्र,
विरह और  नामिलन......
फिर भी किया नहीं उफ भी एक पल 
सतत लड़ा आजादी का सपूत 
रक्त का हर एक बूँद बहाकर

युवाओं से है मेरी पुकार 
बना लो ऐसी एक मजबूत कतार
तोड़ ना सके जिसे कोई.....
धर्मं, भ्रस्टाचार और आतंकवाद   
अब ना करो और जादा देर
कहीं हो ना जाये शीशे जितना कमजोर 
मेरा यह देश.....
जिसपर हम चढ़ा ना सकें फूल, पत्ती और पराग 

टी पी सिंह 
(चित्र साभार गूगल)


 

Tuesday, March 16, 2010

ये नहीं है मेरी बरेली........

ये नहीं है मेरी बरेली
जहाँ हाथ में धर्मं का है छूरा
मन में अंधविश्वास की छाया
आदमी-आदमी को मार रहा
ना कोई मोह ना कोई माया

मानवता के हो गए टुकड़े टुकड़े
हर टुकड़े पर घाव बेसुमार
जल रहे हैं घर एक-एक कर के 
सपने थे जिसमें दस हजार

फफक-फफक कर रो रहा 
वह मंदिर और मस्जिद में
भूल हो गयी थी उससे
जो बना दिया इन्सान

Saturday, March 13, 2010

खंजर....समुन्दर....आग

दिल में उतर कर कहते हो 
दर्द तो नहीं है,
खंजर मार कर कहते हो 
जख्म तो नहीं है,
सिकायत करूँ भी तो किससे करूँ
जज, मुजरिम और महबूब भी तुम्ही निकले 


सांसों को चुराकर कहते हो 
भस्म तो नहीं है,
समुन्दर को छेड़ कर कहते हो 
लहर तो नहीं है,
जज्बात को रखें थाम कर तो कैसे रखें  
मीत, प्रीत और तूफ़ान भी तुम्ही निकले 

सपनों में आकर कहते हो 
प्यार तो नहीं है,
आग पानी में लगा कर कहते हो 
धुवां तो नहीं है,
लुटने से रोकें दिल को तो कैसे रोकें 
चाभी, तिजोरी और मालिक भी तुम्ही निकले

Friday, March 12, 2010

नहला दे सबको सदाचार में............

बादलों के रथ पर बैठ जा 
ग्रहों को बना ले अपना घर,
हाथ सेंक सूरज की तपस से
प्यास बुझा समुन्द्र के जल से...

गति में पछाड़ दे मन को 
इच्छा को बाँट दे दान में,
चन्दन का लेप लगा लोभ पर 
विजय श्री कहला क्रोध का...

दौड़ कर पकड़ ले सोंच को 
बैर को खिला गुड,
तमस को भगा जीवन से 
परोपकार को गहना पहना... 

समय का है उदघोष 
उड़ खड़ा हो जा अब...
मिटा दे अल्पविराम
जाति, धर्म के पृष्ट से,
नहला दे सबको 
सदाचार में...........





दूनिया कहेगी ...पहले आप...पहले आप......

जिंदगी के मार से मर जाना नहीं 
कल्पना के भंवर में उलझ जाना नहीं,
सोंचते रहना अगली कश्ती को 
समय को यूँ ही गवाना नहीं....

शब्दों के जाल में फसना नहीं 
भावनाओं के लहरों में बहना नहीं,
देखते रहना अपनी मंजिल को 
बीच राह में रुक जाना नहीं....

रात के अँधेरे से डरना नहीं 
मुश्किलों से घबराना नहीं,
बड़ते रहना सतत आगे 
ऊँचे रास्तों पर डगमगाना नहीं....

हो जाएँगे तेरे सारे सपने पूरे 
आकाश तक होगें तेरे हाथ,
धरती होगी कदमों में 
और दूनिया कहेगी...
पहले आप...पहले आप........ 






Wednesday, March 10, 2010

बनते मकान में........लगा है उसके ही सपनों का गारा

बिखरे पड़े हैं टूटे पत्थरों में
कहीं उसके सपने 
जो टूटे थे पत्थरों के साथ
बिना आवाज किये 
धूल बनके उड़ गए 
एक-एक करके सारे सपने 
अब बदली सी छायी है
आँखों में उसके, इन 
बनते मकान में....


दीवारों में चुनते जा रहे हैं 
कुछ भारी कुछ हलके पत्थरों के साथ 
रो रही है अपनी किस्मत पर 
बटोर के खुदी दे रही है उन पत्थरों को 
जो सबूत हैं उसके टूटे सपनों के 
अभी भी है उम्मीद उसे 
छूट जाये कोई पत्थर 
बच जाये कोई दीवारों में चुनने से
जिसमें लगा है उसके ही सपनों का गारा, इन 
बनते मकान में....





Tuesday, March 9, 2010

बनते मकान...बन गए हैं श्रृंगार....

बनते मकान में
चल रही है नंगे पैर 
सर पर पत्थर की टोकरी 
नाप रही दोपहरी की धूप 
बहता पसीना, सूखा जिस्म
मन में द्रोपदी सी लज्जा 
आँखों में नमक का समुन्दर 
है ना कोई आस जिंदगी से
ना कोई मंजिल....
बनते मकान में 

बालों में सूखे पत्ते 
पैरों में मिट्टी की पायल 
कमर में लटकती थकान 
हाथों में रस्सी की बेडी
बन गए हैं श्रृंगार...
उसका नहीं ये पहला श्रृंगार
सजी है वो कई बार 
बनाया है उसने कई मकान 
पर कब करुँगी वो श्रृंगार
अपने मकान में, इन 
बनते मकान में