Saturday, May 8, 2010

हरिवंश राय बच्चन जी को समर्पित "प्रियतम की बाला"........'तेज'

प्रिय की अधर रस में भीगी माला,
अपने ही सृंगार में डूबती छाला,
रंग रूप के आवेग में समाती बाला,
मृद मधुर मिलन करने आती नित्य देवाला।।9।

बार-बार मद-मस्त आता पीनेवाला,
छल से छलकती घूँट में जीता जीनेवाला,
छलकते प्याले को होंठो से पोंछती बाला,
दर्शन आश में प्याले पर प्याला पीती, देवाला।।10।

कल्पना के भंवर में उमड़ती इन्द्र-माला,
सुन्दर अंगूरी रस में खोई अप्सरा मधुबाला,
एक बूंद जो गिरे स्वर्ग से, अमर हो जाये बाला,
भूल जाये विरह और ना जाये दुबारा, देवला।।11।

निलांगु होंठ हुए प्रिये-प्रीतम चूमते मीत-माला,
मर्यादा में राम, रास-लीला में कृष्ण-राधा,
धन्य हो जाये जो धरा, आज तेरे प्रेम से बाला,
ना लेगा अवतार फिर और एक, देवाला।।12।

अंगूरी पुष्प पर मंडराता भौंरा पीनेवाला,
जीवन की गहराई, प्याले में नापता मतवाला,
जब उतरी प्रिये के आँखों में मेरी चंचल बाला,
लगता हर प्याला उसे खाली, फीकी, देवाला।।13।











Conti..
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Thursday, May 6, 2010

बाला...नये रूप में.......`तेज`

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है.
"बाला" जो की यहाँ "मन" के रूप में होगी, "मधुशाला" "देवाला" और "हाला" "माला" के रूप में. मैंने "बाला" पर जादा जोर दिया है, की वह क्यों देवाला जाती है.

सुख संचित कर हंसती-खिलखिलाती,
जीवन के रंग को जीती-सहलाती,
दुःख में पाँव पसार सोती बाला,
मिलती उसे जब देवाला की माला।।1।

अँधेरी तरंगो के भीगे नीले नभ में,
भंवर की सिमटती लम्बी गहराई में,
जीवन की अटखेलियाँ करती बाला,
आती जब वह भुलाने दुःख, देवाला।।2।

सपनों की गहराई में दिन-रात खोई,
हाथों में माला लिए सुख की, रातों रोई, 
इससे अच्छा नहीं कोई शिवाला, कहती बाला 
जहाँ पराये लगते भाई, आती जब देवाला।।3।

दूनिया के दर्द से जब थक जाती,
भीड़ के थपेड़ों में जब खो जाती,
रिश्तों में जब कभी अकेली होती बाला,
अपनों से तब मिलने आती वह देवाला।।4।

कुछ करने की भड़ास में जब रह जाती,
रिशवत के चंगुल में जब फंस जाती,
बड़े सपनों के बोझ में जब दब जाती बाला,
पूरा करने तब अरमान सारे आती वह देवाला।।5।

विधवा की जवानी, गद्दार की देश भक्ति से,
राजनीति के गंदे रंग, आतंकवाद की शक्ति से,
जब खिन्न हो जाती चंचल अलबेली बाला,
आती नई सुबह के इंतज़ार में लेने माला, देवाला।।6।

महबूब की मीठी सुनहरी बीती याद में,
सुन्दर बालाओं और मिलन की आश में, 
भरे प्याले की कलकल गहराई में, बाला
जीवन खोजने आती, लेने माला, देवाला।।7।

नेता-भ्रस्टाचार के भरोसे छोड़ देस-ईमान,
मंदिर-मस्जिद में छोड़ भगवान-अल्ला,
रामायण-कुरान में छोड़ राम-रहीम, बाला 
आती क्यों करने अपमान, पहन माला, देवाला।।8। 
Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Tuesday, May 4, 2010

देवाला की माला....

(2)
अँधेरी तरंगो के नीले नभ में
भंवर की सिमटती गहराई में 
सुलगती आग की लपट में
अटखेलियाँ करती बाला....
विधवा की जवानी 
गद्दार की देश भक्ति 
राजनीति के गंदे रंग
और आतंकवाद की शक्ति 
से खिन्न होकर आती बाला 
डालने देवाला के माला....
महबूब की मीठी याद में
मिलन की सुन्दर आश में 
थिरकती सुन्दर बालाओं में 
जीवन खोजने आती बाला 
लेने देवाला की माला....
Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Monday, May 3, 2010

बाला......

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है.
बाला जो की यहाँ मन के रूप में होगी, मधुशाला देवाला और हाला माला के रूप में.

(1)
सुख संचित कर हंसती बाला,
जीवन के रंग को जीती बाला
दुःख में पाँव पसार सोती बाला,
मिलती उसे जब देवाला की माला

दूनिया के दर्द से जब थक जाती बाला,
भीड़ के थपेड़ों में जब खो जाती बाला,
रिश्तों में जब कभी अकेली होती बाला 
अपनों से तब मिलने आती वह देवाला  

कुछ करने की भड़ास में जब रह जाती बाला 
रिशवत के चंगुल में जब फंस जाती बाला
बड़े सपनों के बोझ में जब दब जाती बाला
पूरा करने तब अरमान सारे आती वह देवाला  

Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Friday, April 30, 2010

मैं था जिनके इंतज़ार में............

मैं था जिनके इंतज़ार में
ख़्वाबों का दिया जलाये 
हो गए वो किसी और के 
बिना अश्कों में आग लगाये....
सावन की बूंदों में गिरता रहा
मेरा ये अश्क लहू बनके
मुस्कुराते रहे वो उनकी बाँहों में
बिना शर्मों-हया शाजाये......
बैठा रहा मैं उनकी आश में, 
मिलन की शमा जलाये
और वो चले गए मंदिर से, 
बिना चौखट पर मत्था टिकाये....













 तेज प्रताप सिंह 'तेज'  
(चित्र साभार गूगल)

Tuesday, April 27, 2010

फहरा दो पताका............

जिंदगी के सवालों से परेशान 
बहुत हो गाया, अब और नहीं 
इस बार बदल कर रहूँगा 
अपनी किस्मत.......
लडूंगा हर कठिनाईयों से
हिमालय के शिखर तक पहुचूँगा 
सारे बंधन तोड़ दूंगा....
चाहे कुछ भी हो जाये
इस बार बदल कर रहूँगा 
फिर धीरे से समझाता है 
अपने को....
ये नहीं मेरी बस की बात 
मैं नहीं बदल सकता
अपनी किस्मत.......
ये सब है ऊँचे महलों वालों की बात
मैं तो ठहरा छोटा सीधा इन्सान 
भूल गाया वह 
किस्मत नहीं किसी की गुलाम 
सबको देती है मौका एक बार 
इसलिए हे किस्मत को कोसने वालों
अब और देर मत करो 
उठो हरहराकर, तोड़ दो सबके भ्रम
कूद पड़ो पल हर पल की जंग में
फहरा दो पताका जीत का
जिंदगी के इस रथ पर....

तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Monday, April 26, 2010

कहीं किसी सड़क पर...........

दिन प्रतिदिन की भीड़ में 
कहीं किसी सड़क पर
चिलचिलाती धूप में नगें पैर 
दौड़ती इधर-उधर.....
कभी हिस्से में मिलती नई 
तो कभी डामर से लतफत सड़क 
देखती एक टक चलते लोगों को 
तलाशती कोई अपना इन बदलते 
लगों में चलती सड़क पर
दुःख ने छोड़ा ना उसका साथ
बचपन में मिला क्यों अभिशाप 
मिलता दिन-प्रतिदिन अवसाद
आज फिर से.....
आँखों में रात की गहराती नींद
सोई नहीं अवसाद के डर से 
निहार रही वह..... 
आते जाते लोगों की भीड़ 
निकले इधर से आज कोई अपना 
नहीं तो देके जाये
दो पैसा भीख

Sunday, April 25, 2010

घाव से भरा पत्र.........................

दर्द और यादों का समेटा है
हर पल का लुटता सवेरा है
घाव से भरा पत्र.... 
जो उसने आज माँ को भेजा है

निकालो मुझे इस अन्धकार से बाहर 
की सवेरा भी अब मुंह छिपाने लगा है
मैं और जिन्दा रह नहीं सकती 
बिना वजह आसुओं के घूँट 
पी नहीं सकती.....
बाबा को जल्दी भेजो यहाँ 
उनकी लाडली जिन्दा रहते अब और 
मर नहीं सकती.....
अरमानो के झूले पर अभी है उड़ना मुझे 
की इतनी जल्दी मैं एक ढेला जहर का 
खा नहीं सकती.....

एक-एक करके बिक रहे हैं सारे सपने 
जिंदगी का दिया भी अब बुझने लगा है
इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं माँ की 
दहेज का तेल अब चुकने लगा है........

तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Wednesday, April 21, 2010

ये थीसिस अगर मिल भी जाये तो क्या है..!!

ये पेपर.. ये जर्नल.. ये रिसर्च की दुनिया
ये बालों की दुश्मन कीताबों की दुनिया
ये पब्लीकेशन की भूखी लोगों की दुनिया 

 ये दुनिया अगर मील भी जाये तो क्या है...!!
हर एक स्कॉलर घायल.. है रूह उसकी प्यासी..
नीगाहो में उलझन दिलों में उदासी
ये लेब है या आलम बद-हबासी
ये अनालिसीस अगर हो भी जाये तो क्या है..!!

यहाँ बस चपरासी है हर स्कॉलर की हस्ती..
ये बस्ती है बस बूड़े प्रोफेसर्स की बस्ती..
स्कॉलर्स की जवानी है उनके बुडापे से सस्ती..
ये एक्सपेरिमेंट अगर हो भी जाये तो क्या है..!!

लड़का भटकता है बेकार बन कर...
लड़की के पेपर छपते है एहसान बन कर...
रिसर्च यहाँ होती है व्यापार बन कर...
ये रिसर्च अगर हो भी जाये तो क्या है...!!

ये दुनिया जहाँ दिमाग कुछ नहीं है
पेपर के आगे दोस्ती कुछ नहीं है..
वफ़ा कुछ नहीं प्यार कुछ नहीं है..
ये पेपर अगर छप भी जाये तो क्या है..!!
जला दो इसे फूंक डालो ये जर्नल
मेरे सामने से हटा लो ये थीसिस
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये लैब
ये थीसिस अगर मिल भी जाये तो क्या है..!!
(एक मित्र ने ईमेल से भेजा)

Tuesday, April 20, 2010

रेलगाड़ी से उतरना मना है...यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है

रेलगाड़ी से उतरना मना है यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, चलिए थोडा और आगे चलते हैं.
(9)
यार मोटे उ रामखेलावन का क्या हाल चाल है
छोड़ा पूराने, अब हमार उनसे ना पटत है...
काहे का हो गाया...
बस ऐसे ही, कोई खास बात ना बा...फिर भी 
अरे उ ससुर रामखेलावन का जोन लड़का बा बहुत सेखी मारत रहा...
का हुआ...अरे कछु अंग्रेजी का जान गा है..हमेशा भाव मारत रहत है 
जब देखो तब कुछ ना कुछ अंग्रेजी मां बोल कई, हंसी उडावत है..अब हमका तो इतना आवत ना
हाँ ई तो गलत है, बड़ों का ध्यान रखना था उका....पर हुआ का ?
अरे एक दिन उ कुछ अंग्रेजी मां बोलिस हमका ना बुझिल..तो हम उ से बोला..
जानित है तू बड़का अंग्रेज हो..पर जोन हम कही उका तू अंग्रेजी मां बोल कय देखाव तो मानी..
हाँ, तो का पूछे उससे..पूराने बोला
हाँ मैंने पूछा...
झपट झंझला झूम झट झाम झूम झकझोर
दांव पेंच करने लगे दोनों-दोनों ओर
ईका अंग्रेजी मां अनुवाद करो....
अरे मोटे तू तो जान मार दिहो...कुछ बोला फिर वह....
ना दुबारा ससुर नजर नहीं आवा...तबसे हमार उनके घर से थोडा अनबन है
उनके घर वाले कहत हैं की तोका हमरे लड़का से जलन है...
मारो ससुर का, जैसे को तैसा...सही कहा पूराने 
(10)
मोबाइल का बुखार इस कदर लोगों में लगा की हर किसी ने इसे ख़रीदा. स्वामी से भी रहा नहीं गाया...
दीदी तेरा देवर दिवाना ...हाय राम कुड़ियों को डाले दाना.......
ये गाना कहाँ से आवत है...अरे रुका मोटे ई हमरे संचार यन्त्र की आवाज है
संचार यन्त्र......ई कौन सी बला है.......
अरे उ हमरा मोबाइल..अभी निकालत हूँ उ का झोला से..
अम्मा बोल पड़ीं, कितने का ख़रीदा...
अरे ससुर को पूरे १२०० में लिया है...मस्त चीज है 
अच्छा जब खरीद ही लिया है तो अब लो एक नंबर मिलाओ हमरे घर 
कोई जरुरी बात है तो बोलो..ससुर मां अभी खाली ५ मिनट बचा है 
हाँ..मिलाओ जरुरी है...पर अम्मा देख लो खाली ५ मिनट है
मिला ना...लो फिर मिलाता हूँ ....
हलू कौन बोलत हो, हम अम्मा बोल रही हूँ.......
अरे अम्मा हाँ का हाल है, आप आश्रम कब आयीं
....हाँ हम स्वामी के मोबाइल से बोल रही हूँ.....?   
स्वामी के मोबाइल से!!!...जय हो स्वामी जी...  
तो आपकी नित्यानंद स्वामी जी से कब मुलाकात हुई...
आज कल तो हमारी उनको कोई याद भी नहीं आती...आप ही लोगों में लीन रहते हैं 
अरे उ स्वामी नाहीं...स्वामी...गाँव वाला 
का अम्मा यंत्र हमका दो...हम बात करीत है 
हाँ..आप कौन...स्वामी ने पुछा
हाँ, अच्छा..नमस्कार..इतने में मोबाइल कट गाया 
देखा..बोलेन रहा ५ मिनट बचा है....जब बात करेक नाहीं आवत तो काहे हमेशा...????
गलत नंबर मिल गवा रहा का..अम्मा बोली 
स्वामी...हाँ, कोई आश्रम का नंबर था....
सब तेरे नाम के कारण हुआ है, ना तेरा नाम स्वामी होता ना देर तक बात होती
अब तो सारी गलती हमरे नाम की ही है....स्वामी झल्ला कर बोला  
Conti....
तेज प्रताप सिंह 'तेज'