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Friday, April 9, 2010

विधवा-शहीद

सफेद वस्त्रों में लिपट गयी 
छोड़ कर जीवन के रंग 
एक ही सवाल है बस मन में 
क्यों गए मेरे पिया छोड़ मेरा संग 
रात होती थी पहले दिन के बाद 
अब तो दिन भी लगते हैं रात 
इंतज़ार का दुःख भी खत्म हुआ 
बचा शेष तो सिर्फ अवसाद 

जननी को समर्पित मेरा यह प्यार 
याद दिलाएगा शादियों तक बार-बार 
गर्व से मैं भी कहूँगी आज से.....
विधवा-शहीद कप्तान हरदीप सरदार 
किसने दिया यह नाम नक्सलवाद 
जो धीरे-धीरे बनता जा रहा आतंकवाद
उखाड़ो इसे कहीं निगल ना ले ये 
एक और दांतेवाड़ा जवान कप्तान 



4 comments:

  1. marmsparshi...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. एक विधवा की वेदना को मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है आपने!

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  3. Tej agar green color wali panktiyon ko aise likho to shayad aur nikhre-
    pahle din to aata tha har ik jati raat ke baad
    ab to kewal raat dhale fir raat hai aati
    intzar ke dukh ka pani boond-2 kar fisal gaya
    sirf jara avsad samandar rahta is jeevan me baaki

    Dr. HariOm Pawar ki isi tarah ki panktiyaan dekho-
    'do boond aankh ke paani se ye saat samandar hara hai
    jab mehndee wale hathon ne mangalsootra utara hai'

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