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Thursday, May 20, 2010

स्वामी प्रेम .................'तेज'

छोड़ मेरा संग
प्रिये गये कहाँ
विरह की अग्नि में
तन-मन भस्म यहाँ।

गृह स्वामी दर्शन में 
मृग नयन पथरायी
हर्दय में शेष कंपन
मिलन मात्र बवरायी।

त्याग परदेश प्रेम
चरण धरो गृह चौखटा
जो बना है बिना हरण
रावण अशोक वाटिका ।


'तेज'
 

10 comments:

  1. भाई, उम्‍दा शीर्षक

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  2. भावपूर्ण रचना..अच्छी लगी..बधाई

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  3. बहुत सही...चित्र पर कविता पढ़ने में थोड़ा तकलीफ हो रही है. अलग से चित्र लगायें तो बेहतर. सुझाव मात्र है.

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  4. रचना के साथ तकनीकी का बढ़िया संगम!

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  5. waah sundar...ati sundar...aur Tej ji aapki baat ka ek al ye ho sakta hai..ki lekhak aur kavi 5 me se 2 rachnaayein shuddh hindi me likhein...ise kam se kam bhasha ka yah praaroop jeevit rahega..

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति...text colour थोडा चित्र में पढने में बढा दे रहा है....

    चित्र रचना के अनुरूप...बढ़िया लगा

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  7. Sundar rachna..lekin kuchh der nazarhi nahi aayi..chitr me kho rahi hai!

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  8. बहुत सटीक कविता,

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