Tuesday, December 7, 2010

मेडिकल प्रवेश परीछा

आदमी अपने जीवन में ऐसे बहुत सारे आयामों से गुजरता है जहाँ वह अपने आप को अकेला पता है. कुछ इसी तरह आज प्रताप महशूश कर रहा है. ५ साल पहले जब उसने मेडिकल की तैयारी शुरु की थी तब उसे नहीं पता था की वह कभी ये दिन भी देखेगा पर प्रताप को देखना पड़ा, कारण उसे भी पता नहीं था.

लगातार प्रयास के बाद भी प्रताप का चयन एम. बी. बी. स मेडिकल प्रवेश परीछा में नहीं हुआ यह उसका ५ वां साल था. प्रताप ने जब मेडिकल प्रवेश की लिए तयारी शुरु की थी तब उसके हाथ में १० + २ डिग्री थी और आज भी वही डिग्री. ऐसा नहीं था की प्रताप पढने में होशियार नहीं था पर किस्मत में जो लिखा था वही हुआ. लगातार 4 वर्षों तक उसका चयन बी. च. एम्. एस और बी. वी. स. सी  में हुआ पर जनरल कोटे में सीट कम होने से उसे एम. बी. बी. स नहीं मिल पा रहा था, कुछ, २-३ नंबर कम रह जा रहे थे. प्रताप ने एम. बी. बी. स करने के धुन में किसी में भी दाखिला नहीं लिया. यह उसका ५ साल था और उसने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

आज ही मेडिकल का रिजल्ट आने वाला था, प्रताप को उसका बेताबी से इंतज़ार था पर जब उसने सुबह अखबार देखा तो उसके होश उड़ गये. मेडिकल का रिजल्ट रोक दिया गाया था कारण पेपर लीक होने का मामला था. प्रताप को तो ऐसा लग रहा था जैसे की अभी वह धडाम से जमीन पर गिर पड़ेगा. वैसे पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं थी पर इस बार पूराने सारे रिकॉर्ड टूट गये थे, ५०-५० हज़ार में कोचिंग वालों ने पेपर बेचे थे कुछ टेस्ट सिरीज के नाम पर तो कुछ गेस पेपर के नाम पर. अब कोई कितना भी मेहनत कर ले क्या फर्क पड़ता है चयन तो उन्ही का होगा जिनके पास ५० हजार हैं. 

प्रताप बहुत टूट गाया था और उसमें कुछ भी सुनने और समझने की ताकत नहीं बची थी. मायूस होकर जब वह घर पहुंचा तो घर वाले उसे ही गली दे रहे थे की ५ साल से तयारी कर रहे थे तुम होना होता तो हो गाया होता अब आगे क्या करने का विचार है. सभी घर वालों ने उससे मुहं मोड़ लिया की कहीं ऐसा ना हो की प्रताप को फिर से एक साल के लिए पैसे देने पड़े. अब प्रताप इस मोड़ पर है की उसके पास सिर्फ १०+२ की डिग्री है जिसके बल पर उसे कहीं नौकरी नहीं मिल सकती.

यह कहानी कितने और लोगों की होगी कहना मुस्किल होगा पर इतना तो साफ़ है की आजाद भारत को एक बार फिर से आजाद होना होगा इन माफियाओं, सरगनों और दबंगों से...........

तेज प्रताप सिंह "तेज"

Saturday, November 27, 2010

मेरे अब तक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन ....

नवम्बर १९, २०१० मेरे अब तक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन रहा. इस दिन मुझे मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़, ऑस्ट्रिया, यूरोपे द्वारा पी.एच.डी. की डिग्री प्रदान की गयी. यह डिग्री मुझे मोलीकुलर मेडिसिन में मेरे द्वरा सोरियासिस और इम्यून सिस्टम में किये गये कार्य के लिए दिया गाया है. दूसरी जो खुशी की बात है वो ये की इसी कार्य की लिए मुझे २०१० का सनोफी अवेंतिस पुरस्कार भी दिया गाया जो की प्रति वर्ष मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़ में चिकित्सा विज्ञान में शोध के लिए किये गये महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है. यह पुरस्कार मैंने दो अन्य लोगों के साथ साझा किया. मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़ में कार्य करते हुए मैंने प्रथम लेखक के रूप में दो अंतराष्ट्रिये शोध पत्र, The Journal of Immunology और The American Journal of Pathology (in press) में प्रकाशित किये और कई अंतराष्ट्रिये कोन्फेरेंस में भाग लिया.
आज मैं अपने आप को बहुत गौरवानित महसूस कर रहा हूँ की गोंडा, यू.पी. से मैं यहाँ तक पहुंचा और उन लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन लोगों ने मुझे यहाँ तक पहुँचने में सहयोग दिया. आखिर में मैं इसका पूरा श्रेय अपने परिवार और गुरु जनों को देना चाहूँगा जिनका सहयोग अमूल्य रहा.
अधिक जानकारी के लिए नीचे लिंक्स दे रहा हूँ.
नीचे कुछ तस्वीरें भी डाल रहा हूँ...................धन्यवाद  

तेज प्रताप सिंह 

 पी.एच.डी. दीक्षांत समारोह 

सनोफी अवेंतिस पुरस्कार

Monday, October 25, 2010

"भारत-यास्क"

आज आप जो यहाँ पढेंगे वो मेरे द्वरा लिखी जाने वाली पुस्तक के कुछ अन्स है, प्रोत्साहन सर्वोपरी.....

हजारों समय काल गये बीत,
तब धरा पर सत्य आया है,
मानवता के खातिर सर्वग्य लुटाने,
"भारत-यास्क" आया है...

अखंड भारत का जिसका है स्वप्न,
जननी-जन सेवा जिसका है धर्म,
अनीति पर नीति की विजय दिलाने,
"भारत-यास्क" आया है...

सभी को मिले न्याय का अधिकार,
जहाँ हो सुख समृधि, ना कोई विकार,
करने एसे एक नये युग की शुरुवात,
"भारत-यास्क" आया है...

"तेज"

आज उसने ना पूछा हाल मेरा....."तेज"

आज उसने ना पूछा हाल मेरा
कैसे हो, कैसी कटती हैं रातें,
क्या खाया, गये थे कहाँ आज,
भूल से गये सारे सवाल उनको.........
पहले तो हर पल की खबर रखते थे,
हर पहलू में खोजा करते थे मुझको,
हर एक आहट पर सहम जाया करते थे......
उन्ही की सांसों में बसा करती थी मेरी सांसे,
आँखों की पुतली में रौशनी बनकर रहते थे,
हुआ क्या जो वो रूठ गये मुझसे,
चले गये क्यों छोड़, मुझे मेरे इस हाल में.............

"तेज"

Tuesday, October 19, 2010

चाहता हूँ,..........तेज`

अपनी आँखों में उनकी सूरत उतारना चाहता हूँ,
बंद पड़ी किताब को फिर से खोलना चाहता हूँ,
पन्ने जो छूट गये थे बिना पढ़े,  
उन्हीं को आज फिर से पलटना चाहता हूँ । 


उनके प्यार की झांकी फिर से देखना चाहता हूँ,
दिल में बने घर को फिर से खोलना चाहता हूँ,
रंगोली जो छूट गयी थी बिना रंगों के,
उन्ही को आज फिर से सजाना चाहता हूँ । 


उनकी नाजुक अदाओं में खुद को डुबोना चाहता हूँ,
नुक्कड़ पर बनी मधुशाला फिर से खोलना चाहता हूँ,
कहीं बीत ना जाये जवानी के ये पल,
इसी डर से मुहब्बत का एक और घूँट पीना चाहता हूँ । 

`तेज`

Thursday, September 23, 2010

रेल गाड़ी फिर से पटरी पर .....'तेज'

काफी दिन बाद आने का मौका मिला...चलिए यात्रा आगे बढ़ाते हैं....
(11)
जिस सीट पर स्वामी बैठा था उसी के ऊपर वाली सीट पर एक और यात्री सो रहा था पर बार-बार स्वामी से पूछ रहा था.....
भाई रामनगर आ जाये तो बता देना
स्वामी बोला हाउ बता दूंगा .....
थोड़ी देर बाद फिर से वह यात्री बोला रामनगर आ गाया क्या (सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ)
स्वामी बोला अभी नहीं...आयेगा तो बता दूंगा
१० मिनट भी नहीं गुजरा था की वह फिर बोल पड़ा...आ गाया क्या
स्वामी झल्ला कर दूसरी सीट पर जाकर बैठ गाया..
इतनी देर में ट्रेन रामनगर रुकी पर इसबार उस यात्री ने किसी से कुछ नहीं पूछा.....
थोड़ी देर बाद वह यात्री फिर जगा और स्वामी के पास जाकर पूछा, रामनगर आ गाया क्या....
स्वामी गुस्से में बोला हाँ भाई... रामनगर तो कब का निकल गाया....
यात्री पहले थोडा सकपकाया फिर बोला..चलो कोई बात नहीं फिर से वापस आ जाऊंगा इसी ट्रेन से (सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ).......
स्वामी बोला-और वो टिकट
टिकट वो क्या होता है वो तो मैंने आज तक नहीं लिया....
पकडे गये तो....??
तो क्या हरजाना भर दूंगा.....
भाई लेकिन वो तो तुम्हारे टिकट की दाम से तो बहुत जादा है...
लेकिन यह मेरा २०वा चक्कर बिना टिकट...जोड़ो तो ऊससे तो बहुत कम है, और अगर बच गाया तो २१वा
महान है भाई तू तो.... स्वामी बोला
आप भी महान बन सकते हो....(सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ).......और फिर जाकर सो गाया
(12)
मोटे बहुत आराम से अपने सीट पर चुपचाप बैठा हुआ था...ये स्वामी से देखा ना गाया और पूछ पड़ा
यार मोटे ई तू इतना चुपचाप कैसे हो कौनो दवाई मिल गयी है का..मैं ही तब से बोले जा रहा हूँ
मोटे बोला इमां कोई खास बात थोड़ी ना हा....
स्वामी..फिर भी इतना चुप-चाप तुमका पहले नहीं देखा ना
अच्छा तुम भी जाना चाहत हो कैसे
हाँ बिलकुल मोटे......
तो फिर अपनी हाथ की कौनो दो अंगुलिओं को आपस में मसलना शुरु कर दो....अपने आप चुप हो जाओगे
स्वामी हाँ में हाँ मिलाता हुआ अंगुलिओं को आपस में मसलना शुरू कर दिया फिर ५ मिनट बाद झल्ला कर बोला निहायत बेकार का आईडिया है तुम्हार...इससे भला कोई चुप कैसे रहा सकता है...
मोटे थोडा मुस्कुराया फिर बोला रह सकता है
रहने दो तुम अपनी ई बेकार के नुस्खे........
हाउ.. पर स्वामी तुमने अंगुलिओं को आपस में मसलने से पहले उसे नाक के अन्दर डाला था की नहीं.....
ससुर तुम तो कमाल के हो कोई नहीं पहुँच सकता है तुम तक ....

'तेज' 

Thursday, September 2, 2010

वैशाखनंदन सम्मान

(आज मिला एक खुशी भरा ईमेल)

माननिय श्री तेज प्रताप सिंह जी
सादर अभिवादन
आपके द्वारा प्रतिभागी के बतौर दिये गये सहयोग के लिये हम आपके अतिशय आभारी हैं.
इस प्रतियोगिता में आपकी रचना को कांस्य सम्मान से नवाजा गया है. इस हेतु आपको
सुश्री सीमा गुप्ता की काव्यकृति विरह के रंग की प्रति भेजी जानी है. आपसे निवेदन है कि
लौटती मेल से आपका भारत का पोस्टल पता हमें भेजे जिससे आपको यह प्रति भिजवाई 
जा सके.
ऐसे आयोजनों के लिये भविष्य में भी आपके सहयोग के आकांक्षी रहेंगे.
आपके प्रमाणपत्र का कोड नीचे दे रहे हैं. 

सादर
वैशाखनंदन सम्मान कमेटी















वैशाखनंदन सम्मान कमेटी को मेरा धन्यवाद 
तेज प्रताप सिंह

Friday, August 20, 2010

सबसे छोटी जाति किशान

आप सभी लोगों से कभी न कभी ये जरूर पूछा गया होगा की आप क्या करते हैं या आप का बेटा क्या करता है. आज मोहन भी इस सवाल से बच नहीं पाया या यह कहिये की मोहन से जान बूझ कर ये सवाल पूछा गया. मोहन अपने एक मित्र रोहन की शादी में गया था. सभी अपने-अपने तरीके से शादी का आनन्द ले रहे थे तभी अचानक एक आवाज आयी...आरे भाई अन्दर आ जाईये वरमाला पड़ने वाली है. 
"यार मोहन चलो हम भी चलते हैं 
हाँ चलते हैं......"
यह कहकर मोहन अपने उस नए बने मित्र के साथ वरमाला मंच के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया.
दोनों ने वरमाला का रश्म निभाया फिर जाकर रोहन के घर वालों के साथ बातें करने लगे.
"रोहन बेटा इनसे मिलो ये हैं मिश्रा जी...जानते हो इनका बेटा डॉक्टर हो गया है.
ये तो बहुत अच्छी बात है..अब तो आप बहुत खुश होंगे..मोहन बोला 
हाँ भाई मेरे लड़के ने तो मेरा नाम रोशन कर दिया."
मोहन ने सहमती से सर हिलाया और फिर खाना लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद खाना लेकर जब वह लौटा तो वहां पर कुछ और लोग आकर खड़े हो गए थे.
नमस्ते अंकल..मोहन ने विनम्रता का परिचय दिया ????
हाँ नमस्ते बेटा कैसे हो.....!!!!
इतनी देर में रोहन भी वहां आ गया था...
भाई आप के बेटे ने तो वो काम किया है जो काबिले तारीफ है. आईएस बनना कोई मामूली बात तो नहीं हो सकती..
"बधाई हो बेटा......!!
हाँ इतना ही क्यों आप की बहू भी तो अब इंजीनियरिंग पूरा करेने वाली है.
सब आप लोगों की कृपा है...रोहन के पापा बोले"
मोहन भी सब की हाँ में हाँ मिला रहा था की तब तक किसी ने पूछ ही लिया 
"बेटा तुम क्या करते हो....??
थोडा चुप होते हुए बोला मैं तो..!!! कुछ नहीं घर पर ही खेती देखता हूँ.
अच्छा तो किसान हो"...कहीं से एक व्यंग्य भरी आवाज आयी.
"मोहन चुप रहा फिर बोला पता नहीं पर खेती करना मुझे अच्छा लगता है."
अब लोगों ने मोहन से थोडा बात करना कम कर दिया और धीरे-धीरे वहां से हटने लगे. 
उसको ऐसा लगने लगा जैसे अचानक वह अछूत हो गया हो. अब जादा देर मोहन से रुका न गया. मोहन तुरंत वहां से चल दिया पर वह इस बात को सोचता रहा की जब लोगों को यह पता था की मैं खेती करता हूँ तो फिर पूछा क्यों. 
जाति के आधार पर लोगों को बटते तो बहुत बार देखा था पर काम और नौकरी के आधार पर पहली बार ....वैसे भी हमारी जातियां काम के आधार पर ही बांटी गयी थीं पर आज आप इनका हाल तो देख ही रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब ये जातियां विलुप्त हो जाएगी और उनकी जगह नई जातियां आ जायेगी. तब आप को शायद मिश्रा जी, श्रीवास्तव जी, पंडित जी, ठाकुर जी कहकर न पुकारा जाये बल्कि डॉक्टर जी, इंजिनियर जी, मास्टर जी, पुलिश जी, वैज्ञानिक जी......कहकर पुकारा जाये और इनमें जो सबसे छोटी जाति होगी वो किशान होगी. 

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Sunday, August 15, 2010

मैं तिरंगा हूँ,

मैं तिरंगा हूँ,
कोई मिटा नहीं सकता मेरी हस्ती,
बाजुओं में अदम्य ताकत पाई है 
लहराता रहूँगा यूँ ही खुले आसमान में,
निर्भय, अविरल, निस्वार्थ भाव से
और करता रहूँगा सेवा लोकतंत्र की।

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


तेज प्रताप सिंह `तेज´


Friday, August 13, 2010

बटाई का धान

अन्दर से आवाज आई........

"अब तो खुश हो ना
हाँ काहे ना रही...तोका कोनो परेशानी है का
हाँ-हाँ अब तो खुश रहोगे ही..बटाई पर खेत जो मिल गाया है
भला हो राम सिंह का जिसने मुझे शहर में जाकर मजदूरी करने से बचाया"
स्वामी हर छमाही शहर जाता था और घर को चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता था पर इस बार राम सिंह ने उसे कुछ खेत बटाई पर देकर यहीं गाँव में रूककर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. पहले स्वामी थोडा सोंच में पड़ा पर अपनी धर्म पत्नी शोभा के समझाने से वह गाँव में रुक कर खेती करने के लिए तैयार हो गाया.
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 आज राम सिंह बहुत खुश था, होता क्यों नहीं लहलहाते धान के खेत उसकी ख़ुशी और मेहनत के गवाह थे.
"शोभा जानती हो!! धान बेचकर मैं क्या खरीदूंगा?
क्या, भला मैं भी तो जानू?
तेरे लिए गले का हार...मुझे तेरा खाली गला अच्छा नहीं लगता
रहने भी दो ये हार-वार, घर के छत से पानी टपक रहा है पहले वो बनवा लो....
हाँ वो भी बनवा दूंगा...
अच्छा-अच्छा ठीक है अब आकर खाना खा लो.."
स्वामी और शोभा दोनों आमने-सामने बैठकर एक ही थाली में खाने लगे. मन ही मन जैसे दोनों बातें कर रहे हों की फसल कटने के बाद पहले हम राम सिंह के पास जाकर उनका धन्यवाद देंगे की उनकी दया से ही अब हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. राम सिंह जैसा आदमी अगर हर गाँव में हो जाये तो ना जाने कितने मजदूर शहर जाने से बच जाएँ.
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काली रात थी..आसमान में बादल अपने उफान पर थे.
"शोभा ये बादल तो लग रहा है आज कुछ गुल खिला के ही जायेंगे
अच्छा है ना फसल में पानी लग जाएगा
ठीक बोल रही है तू..अब दरवाजा बंद कर दो सोने चलते हैं"
दोनों ने चादर अपने चेहरे पर डाली और सोने लगे लेकिन टपकती छत ने उनकी नीद तोड़ दी ...
"शोभा ये बादल गये नहीं अभी तक
हाँ लग रहा है सही में कुछ गुल खिला कर जाएँगे
बंद कर अपनी ये मनहूस आवाज...शुभ-शुभ बोल!!!"
दोनों के आँखों से नींद जा चुकी थी पर बादल अभी तक नहीं गये थे. एक-एक घडी कर के सुबह कब हो गयी दोनों को पता ही नहीं चला. अगले दिन तो वो कुछ बोलने लायक बचे ही नहीं.

जो फसल उनकी आँखों के सामने कल तक लहलहा रही थी, आज वह पानी में तैर रही थी, मानों इशारे से कह रही हो की मैं तुम्हारी जिंदगी में ख़ुशी ना ला सकी इसका मुझे बहुत दुःख है.
स्वामी के नशीब में तो जैसे शहर में जाकर मजदूरी करना ही लिखा है, बेकार में उसने थोड़ी दिन सपने देखे.
स्वामी ही क्यों और भी हैं जिनके सपने पानी में तैर रहे हैं और ना जाने कब तक तैरते रहेंगे.
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