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Saturday, June 16, 2012

कुछ देर और ठहर जाओ

निन्द्र क्यों आ गयी प्रेम को, अभी तो रात्रि आधी है। 
जो कहनी थी बात हमको, वो बात अभी बाकी है।। 
आज तो घटाओं को जगा कर देखो,
चेहरे से केशुओं को हटा कर देखो,
कल का क्या भरोसा, कल की बात अधूरी है।
आज हैं हम जिन्दा, कल की साँस सौतली है।।
चाँद-सितारे लड़ रहें हैं सूरज से, 
कुछ देर और ठहर जाओ अभी,
कर लेने दो स्पर्श मधुरिमा की, कल वो मिट जायेगा वतन पर। 
फिर होगी शेष रात्रि तुम्हारी, और तुम्ही होगे सरताज धरा के।।


"जय हिंद जय भारत"


डॉ तेज प्रताप सिंह 
15/06/2012
  






1 comment:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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