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Monday, August 1, 2011

सावन

सावन की इन बरसती बूंदों में,
संध्या स्पर्श में कुंठित सरस को तरसे,
सूरज तरसे लालिख लालिमा को,
भोर अपनी रात की ओस को तरसे,
दिन तरसे बादलों की अटखेलियाँ,
और, इन मिश्रित उमंगो की बहारों में,
मेरा पुष्पित मन तरसे पिया मिलन को| 

2 comments:

  1. rimjhim barish ki boonden teri yaado ki treh...mann ko bhigo rahi hain...
    bahut khoob...aabhar...

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