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Sunday, January 9, 2011

मुन्नी का झंडू बाम....

अंतररास्ट्रीय मिडिया में आयी ये रिपोर्ट की अगर भारत में आज लोक सभा के चुनाव हो जाएँ तो कांग्रेस पार्टी को हार का मुहं देखना पड़ेगा. इतना ही नहीं शायद कांग्रेस के बड़े नेता भी चुनाव हार सकते हैं. ये इसलिए क्योंकि देश की जनता भ्रस्टाचार और महंगाई से तंग आ चुकी है. कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह का ये वादा की अगर हम दुबारा सत्ता में आये तो १०० दिन के अन्दर देश बदल देंगे, अब तक देश तो बदल ना पाया पर वादा जरूर बदल गाया. पहले कलमाड़ी जी ने खेल करा कर लूटा फिर राजा ने २ जी का खेल कर डाला, अभी ये खेल खत्म नहीं हुए थे की सिटी बैंक भी इसी कतार में आ गाया. और अब आगे-आगे देखिये होता है क्या....
मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये, कांग्रेस पार्टी बदनाम हुई भ्रस्टाचार में आके<<<<<दोनों बदनाम हुये झंडू बाम लगा के..... 


भ्रस्टाचार का ही नमूना है की छोटे शहरों की हालत गंदे नालों की तरह हो गयी है की कोई भी मूत के चला जाता है. जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में अगर आप चले जाएँ तो शयद ही आप को वहां भीड़ के अतरिक्त और कुछ दिख जाये, डॉक्टर तो आते नहीं जो आते हैं वो मरीज को अपने क्लिनिक पर रिफर करके चले जाते हैं. ऐसा लग रहा है हर कोई लूटने में पड़ा है किसी को भी देश की नहीं पड़ी है. अब भाई जब सरकार ही भ्रस्टाचार में लिप्त होगी तो आम आदमी क्या करेगा उसको भी जहाँ मिलेगा नोंचेगा.

लोग भी क्या करें भ्रस्टाचार का एक घाव भरता नहीं की दूसरा हो जाता है, फिर तीसरा.....चौथा.....इतने घाव एक साथ तो कोई नहीं सह पायेगा...इलाज तो करेगा ही ना. अब यही वो समय है जब देश की जनता को इसका इलाज करना है.
और कुछ इसी तरह का इलाज उत्तर प्रदेश भी मांग रहा है जहाँ हर कोई एक दूसरे की लेने पर तुला हुआ है, कितने करोंड में कौन सी सीट बिकनी है किसे किस छेत्र का वोट काटना है, जातीय समीकरण क्या हैं और कहाँ से से कितना लूटा जा सकता है, इसी में सरकार का सारा ध्यान है. बिहार ने तो अपने दर्द का इलाज कर लिया अब उत्तर प्रदेश की बारी है. अब अगर इस प्रदेश के लोगों से इतना भी नहीं हो सकता तो फिर एक एक ही विकल्प है, मुन्नी का झंडू बाम....

Sunday, January 2, 2011

जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना

जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना
 
घी से भरे दीपक को जला के रखना 
अपने हाथों के सहारे रोके रखना लौ को,
कितनी भी अंधी आये मुझे बुझने ना देना
जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना,

प्यार के हर एक बाण को बचा के रखना
धनुस पर लगा कर रखना तरकश को,
कितनी भी मुश्किल आये मुझे टूटने ना देना
जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना,

आँखों की पलकों पर मुझे बिठा कर रखना 
उतरने ना देना कभी मेरे इन आसुओं को,
कितनी भी धुंध छाये मुझे रोने ना देना
जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना, 

जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना

Saturday, January 1, 2011

आओ खुशियाँ हम मिलकर सजायें

आओ खुशियाँ हम मिलकर सजायें,
दिन जो रूठ गये हैं उन्हें फिर से मनायें,

कहीं किसी उपरी मंजिल से
देखता होगा सूरज...
पिछले साल पुती दीवारों पर 
सूखता होगा मोरंग...
आओ उन्हीं दीवारों पर 
एक और नया रंग लगायें....
रिश्ते जो टूट गये हैं 
उन्हें एक बार फिर से मनायें,

हर आदमीं जैसे कहीं किसी 
धुन में चला जा रहा है...
जीवन के गुड को बिना खाये 
ख़ामोश जीये जा रहा है...
आओ दिनों दिन की बढती 
ख़ामोशी को फिर से मिटायें...
सपने जो पीछे छूट गये हैं 
उन्हें एक बार फिर से सजायें,

आओ खुशियाँ हम मिलकर सजायें,
दिन जो रूठ गये हैं उन्हें फिर से मनायें,

नव वर्ष मंगल मय हो 
`तेज`