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Friday, April 30, 2010

मैं था जिनके इंतज़ार में............

मैं था जिनके इंतज़ार में
ख़्वाबों का दिया जलाये 
हो गए वो किसी और के 
बिना अश्कों में आग लगाये....
सावन की बूंदों में गिरता रहा
मेरा ये अश्क लहू बनके
मुस्कुराते रहे वो उनकी बाँहों में
बिना शर्मों-हया शाजाये......
बैठा रहा मैं उनकी आश में, 
मिलन की शमा जलाये
और वो चले गए मंदिर से, 
बिना चौखट पर मत्था टिकाये....













 तेज प्रताप सिंह 'तेज'  
(चित्र साभार गूगल)

7 comments:

  1. bahut sundar Tej ji....ishq me itna dard...milega milega sachcha pyar milega :)

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  2. prem ki baat chale aur ...ham naa aaye ...aaj tak to aisa nahi huaa...fir aaj kaise hota ...hamne aapki sundar post ,,dhundh hi lee....bahut sundar bas prem par aise hi likhte rahe

    http://athaah.blogspot.com/

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  3. ओह! बहुत बढ़िया भाव बांधे.

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  4. वो चले गए मंदिर से,
    चौखट पर बिना मत्था टिकाये..

    बहुत सुन्दर भावों से सजी है ये रचना......

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  5. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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  6. sir ji aapki tippani ke uttar me kuch kehna chahunga...jo prayas maine kiya tha usme bas ek veshya ki vyatha aur fir samaaj me naariyon ki durdasha dekh kar, us veshya k hridaya ko milne wala sukoon ki kam se kam naariyon ko apmaanit karne wale haivano ko bhi wo sauda karne pe majbor kar deti hai...iska chitran kiya...agli baar aur achcha likhne ka prayas karunga....

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  7. This comment has been removed by the author.

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