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Sunday, February 21, 2010

सकरी गली

उठक पठक से भरी जिंदगी 
सकरी गली में उल्झी जिंदगी  
रोटी  कपडा तक सिमटी जिंदगी 
छोटे में बड़ा पाने की जिंदगी 

एक तरफ कूड़े का कचरा 
तो दूसरी तरफ कटता बकरा
थोड़ी दूर पर है मिठाई की दूकान 
जिसके उपरी मंजिल पर होती है अजान 

आगे है चकला जहाँ मिलती है कमला 
मधुशाला भी दूर नहीं जहाँ टकराती हाला  
बगल दीवारों पर बहता पेशाब बेहिसाब 
जिसपर पान कर रहा अपना हिशाब किताब

भीड़ में गुम नन्हे-मुन्नों की जिंदगी 
बिना कारण इनपर हंसती जिंदगी 
भविष्य का तो इन्हें पता नहीं 
वर्तमान ओड़ कर बैठी है गन्दगी 

सकरी गली सकरी जिंदगी 
बिना पतवार समुन्द्र में बहती जिंदगी 
हर सुबह कीचड़ पोंछती जिंदगी 
हाथ ना लगे बटेर सी जिंदगी 
सकरी गली सकरी जिंदगी

6 comments:

  1. intzaar hai aap ki tipaddi ka, agar aachi lage to jaroor karein

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  2. जिन्दगी के कई रंग...

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  3. कितनी सारी जिन्दगी बटोर डाली कुछ शब्दों में

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  4. chahe jitni bhi sankri ho..jaisi bhi ho..hai to apni zindagi..
    sundar kavita..jeewan ke vibhinn aayaamon ko dikha gayi..
    accha likhte hain aap...

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  5. सकरी गली के माध्यम से जिंदगी का अच्छा चित्रण

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