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Friday, January 8, 2010

हैरान हूँ मैं शब्द की मार से...

हैरान हूँ मैं शब्द की मार से.....
तोड़ता हूँ मरोड़ता हूँ शब्द को,
शब्द की राह और उसकी शाज को!
निकालता हूँ और सुनता हूँ शब्द को,
बिखेरता हूँ और पकड़ता हूँ शब्द को॥
शब्द ही बनाते हैं धुन और सरगम,
जोड़ते और तोड़ते भी हैं दिल! ये शब्द ...
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से.....

प्रेम से नहलाता हूँ शब्द को,
और आंसू पोछता हूँ शब्द से...
रूप और वात्सल्य में नाचते हैं शब्द,
शब्द ही करते हैं महिमा यौवन की॥
उठा कर मारता हूँ शब्द से...
शब्द को ही बनाता हूँ हथियार,
ह्रदय वेदना भी देते हैं ! ये शब्द...
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से .....

छिपा देता हूँ शब्द को कंठ में,
एक नहीं बार-बार तौलता हूँ शब्द को...
हाथ में लेकर प्यार से सहलाता हूँ शब्द को,
फिर धीरे-धीरे बांटता हूँ शब्द को

शब्द ही देते हैं ज्ञान और सम्मान,
राजनीत भी करते हैं शब्द...
निपुण हैं अपनी हर योग्यता में! ये शब्द
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से .....




2 comments:

  1. कितनी ताकत छिपी शब्द की मार में।
    जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

    शब्द पुष्टिकरण हटाने की कृपा करें।
    टिप्पणी करने में दिक्कत होती है!

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  2. शब्दों की महिमा बहुत सुन्दर शब्दों से सजाई है शब्द पुष्टिकरण से टिप्पणी देने वाले को असुविधा होती है ध्यान दें शुभकामनायें

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