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Saturday, January 9, 2010

पिछले सावन का दर्द

सावन को आने दो पूछेंगे उससे
क्या तुम्हें मेरे दर्द का ख्याल न रहा.......

वो भी पल थे जब वो साथ थे तुम साथ थे,
सारे लमहे अपने थे उनकी हर बात महकती थी,
हवा भी उनके साथ चलती थी,
और तुम ही इशारे से उनके आने की खबर दिया करते थे...
आज ना ही वो लमहे अपने रहे;
ना ही तुमने उनके आने की खबर दी.....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!

मैं उनके चेहरे से बालों को हटाता,
फिर धीरे से अधर को अधर के समीप लाता...
उनकी झुकी पलकों के उठने का इन्तजार करता!
इतने में तुम मुझे उनके आंचल से हवा देते...
और वो मेरे और करीब जाते......
इशारे-इशारे मैं दिल के सारे हाल बयां हो जाते थे;
आज ना वो मेरे करीब हैं,
ना ही तुमने उनके आंचल से हवा दी....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!

जब वो मेरे कंधे पर अपना सिर रखकर सो जाते,
तब तुम अपनी ठंडी हवा से उनको जगा देते थे...
बातों-बातों में वो मुझे अधर चुम्बन देते,
फिर किसी बात की उलाहना देकर रोने लगते!
मैं चुप रहकर उनकी हर
अदायें देखता.....
और तुम्हारे ही सहारे उनकी हाँ मैं हाँ मिलाता,
आज
ना ही वो अदायें हैं,
ना ही वो
ठंडी हवा.....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!

सावन को आने दो पूछेंगे उससे
क्या तुम्हें मेरे दर्द का ख्याल न रहा.......


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