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Tuesday, December 7, 2010

मेडिकल प्रवेश परीछा

आदमी अपने जीवन में ऐसे बहुत सारे आयामों से गुजरता है जहाँ वह अपने आप को अकेला पता है. कुछ इसी तरह आज प्रताप महशूश कर रहा है. ५ साल पहले जब उसने मेडिकल की तैयारी शुरु की थी तब उसे नहीं पता था की वह कभी ये दिन भी देखेगा पर प्रताप को देखना पड़ा, कारण उसे भी पता नहीं था.

लगातार प्रयास के बाद भी प्रताप का चयन एम. बी. बी. स मेडिकल प्रवेश परीछा में नहीं हुआ यह उसका ५ वां साल था. प्रताप ने जब मेडिकल प्रवेश की लिए तयारी शुरु की थी तब उसके हाथ में १० + २ डिग्री थी और आज भी वही डिग्री. ऐसा नहीं था की प्रताप पढने में होशियार नहीं था पर किस्मत में जो लिखा था वही हुआ. लगातार 4 वर्षों तक उसका चयन बी. च. एम्. एस और बी. वी. स. सी  में हुआ पर जनरल कोटे में सीट कम होने से उसे एम. बी. बी. स नहीं मिल पा रहा था, कुछ, २-३ नंबर कम रह जा रहे थे. प्रताप ने एम. बी. बी. स करने के धुन में किसी में भी दाखिला नहीं लिया. यह उसका ५ साल था और उसने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

आज ही मेडिकल का रिजल्ट आने वाला था, प्रताप को उसका बेताबी से इंतज़ार था पर जब उसने सुबह अखबार देखा तो उसके होश उड़ गये. मेडिकल का रिजल्ट रोक दिया गाया था कारण पेपर लीक होने का मामला था. प्रताप को तो ऐसा लग रहा था जैसे की अभी वह धडाम से जमीन पर गिर पड़ेगा. वैसे पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं थी पर इस बार पूराने सारे रिकॉर्ड टूट गये थे, ५०-५० हज़ार में कोचिंग वालों ने पेपर बेचे थे कुछ टेस्ट सिरीज के नाम पर तो कुछ गेस पेपर के नाम पर. अब कोई कितना भी मेहनत कर ले क्या फर्क पड़ता है चयन तो उन्ही का होगा जिनके पास ५० हजार हैं. 

प्रताप बहुत टूट गाया था और उसमें कुछ भी सुनने और समझने की ताकत नहीं बची थी. मायूस होकर जब वह घर पहुंचा तो घर वाले उसे ही गली दे रहे थे की ५ साल से तयारी कर रहे थे तुम होना होता तो हो गाया होता अब आगे क्या करने का विचार है. सभी घर वालों ने उससे मुहं मोड़ लिया की कहीं ऐसा ना हो की प्रताप को फिर से एक साल के लिए पैसे देने पड़े. अब प्रताप इस मोड़ पर है की उसके पास सिर्फ १०+२ की डिग्री है जिसके बल पर उसे कहीं नौकरी नहीं मिल सकती.

यह कहानी कितने और लोगों की होगी कहना मुस्किल होगा पर इतना तो साफ़ है की आजाद भारत को एक बार फिर से आजाद होना होगा इन माफियाओं, सरगनों और दबंगों से...........

तेज प्रताप सिंह "तेज"

Saturday, November 27, 2010

मेरे अब तक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन ....

नवम्बर १९, २०१० मेरे अब तक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन रहा. इस दिन मुझे मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़, ऑस्ट्रिया, यूरोपे द्वारा पी.एच.डी. की डिग्री प्रदान की गयी. यह डिग्री मुझे मोलीकुलर मेडिसिन में मेरे द्वरा सोरियासिस और इम्यून सिस्टम में किये गये कार्य के लिए दिया गाया है. दूसरी जो खुशी की बात है वो ये की इसी कार्य की लिए मुझे २०१० का सनोफी अवेंतिस पुरस्कार भी दिया गाया जो की प्रति वर्ष मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़ में चिकित्सा विज्ञान में शोध के लिए किये गये महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है. यह पुरस्कार मैंने दो अन्य लोगों के साथ साझा किया. मेडिकल यूनिवेर्सिटी ऑफ़ ग्राज़ में कार्य करते हुए मैंने प्रथम लेखक के रूप में दो अंतराष्ट्रिये शोध पत्र, The Journal of Immunology और The American Journal of Pathology (in press) में प्रकाशित किये और कई अंतराष्ट्रिये कोन्फेरेंस में भाग लिया.
आज मैं अपने आप को बहुत गौरवानित महसूस कर रहा हूँ की गोंडा, यू.पी. से मैं यहाँ तक पहुंचा और उन लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन लोगों ने मुझे यहाँ तक पहुँचने में सहयोग दिया. आखिर में मैं इसका पूरा श्रेय अपने परिवार और गुरु जनों को देना चाहूँगा जिनका सहयोग अमूल्य रहा.
अधिक जानकारी के लिए नीचे लिंक्स दे रहा हूँ.
नीचे कुछ तस्वीरें भी डाल रहा हूँ...................धन्यवाद  

तेज प्रताप सिंह 

 पी.एच.डी. दीक्षांत समारोह 

सनोफी अवेंतिस पुरस्कार

Monday, October 25, 2010

"भारत-यास्क"

आज आप जो यहाँ पढेंगे वो मेरे द्वरा लिखी जाने वाली पुस्तक के कुछ अन्स है, प्रोत्साहन सर्वोपरी.....

हजारों समय काल गये बीत,
तब धरा पर सत्य आया है,
मानवता के खातिर सर्वग्य लुटाने,
"भारत-यास्क" आया है...

अखंड भारत का जिसका है स्वप्न,
जननी-जन सेवा जिसका है धर्म,
अनीति पर नीति की विजय दिलाने,
"भारत-यास्क" आया है...

सभी को मिले न्याय का अधिकार,
जहाँ हो सुख समृधि, ना कोई विकार,
करने एसे एक नये युग की शुरुवात,
"भारत-यास्क" आया है...

"तेज"

आज उसने ना पूछा हाल मेरा....."तेज"

आज उसने ना पूछा हाल मेरा
कैसे हो, कैसी कटती हैं रातें,
क्या खाया, गये थे कहाँ आज,
भूल से गये सारे सवाल उनको.........
पहले तो हर पल की खबर रखते थे,
हर पहलू में खोजा करते थे मुझको,
हर एक आहट पर सहम जाया करते थे......
उन्ही की सांसों में बसा करती थी मेरी सांसे,
आँखों की पुतली में रौशनी बनकर रहते थे,
हुआ क्या जो वो रूठ गये मुझसे,
चले गये क्यों छोड़, मुझे मेरे इस हाल में.............

"तेज"

Tuesday, October 19, 2010

चाहता हूँ,..........तेज`

अपनी आँखों में उनकी सूरत उतारना चाहता हूँ,
बंद पड़ी किताब को फिर से खोलना चाहता हूँ,
पन्ने जो छूट गये थे बिना पढ़े,  
उन्हीं को आज फिर से पलटना चाहता हूँ । 


उनके प्यार की झांकी फिर से देखना चाहता हूँ,
दिल में बने घर को फिर से खोलना चाहता हूँ,
रंगोली जो छूट गयी थी बिना रंगों के,
उन्ही को आज फिर से सजाना चाहता हूँ । 


उनकी नाजुक अदाओं में खुद को डुबोना चाहता हूँ,
नुक्कड़ पर बनी मधुशाला फिर से खोलना चाहता हूँ,
कहीं बीत ना जाये जवानी के ये पल,
इसी डर से मुहब्बत का एक और घूँट पीना चाहता हूँ । 

`तेज`

Thursday, September 23, 2010

रेल गाड़ी फिर से पटरी पर .....'तेज'

काफी दिन बाद आने का मौका मिला...चलिए यात्रा आगे बढ़ाते हैं....
(11)
जिस सीट पर स्वामी बैठा था उसी के ऊपर वाली सीट पर एक और यात्री सो रहा था पर बार-बार स्वामी से पूछ रहा था.....
भाई रामनगर आ जाये तो बता देना
स्वामी बोला हाउ बता दूंगा .....
थोड़ी देर बाद फिर से वह यात्री बोला रामनगर आ गाया क्या (सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ)
स्वामी बोला अभी नहीं...आयेगा तो बता दूंगा
१० मिनट भी नहीं गुजरा था की वह फिर बोल पड़ा...आ गाया क्या
स्वामी झल्ला कर दूसरी सीट पर जाकर बैठ गाया..
इतनी देर में ट्रेन रामनगर रुकी पर इसबार उस यात्री ने किसी से कुछ नहीं पूछा.....
थोड़ी देर बाद वह यात्री फिर जगा और स्वामी के पास जाकर पूछा, रामनगर आ गाया क्या....
स्वामी गुस्से में बोला हाँ भाई... रामनगर तो कब का निकल गाया....
यात्री पहले थोडा सकपकाया फिर बोला..चलो कोई बात नहीं फिर से वापस आ जाऊंगा इसी ट्रेन से (सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ).......
स्वामी बोला-और वो टिकट
टिकट वो क्या होता है वो तो मैंने आज तक नहीं लिया....
पकडे गये तो....??
तो क्या हरजाना भर दूंगा.....
भाई लेकिन वो तो तुम्हारे टिकट की दाम से तो बहुत जादा है...
लेकिन यह मेरा २०वा चक्कर बिना टिकट...जोड़ो तो ऊससे तो बहुत कम है, और अगर बच गाया तो २१वा
महान है भाई तू तो.... स्वामी बोला
आप भी महान बन सकते हो....(सोना गुनाह है रेल में...बुदबुदाता हुआ).......और फिर जाकर सो गाया
(12)
मोटे बहुत आराम से अपने सीट पर चुपचाप बैठा हुआ था...ये स्वामी से देखा ना गाया और पूछ पड़ा
यार मोटे ई तू इतना चुपचाप कैसे हो कौनो दवाई मिल गयी है का..मैं ही तब से बोले जा रहा हूँ
मोटे बोला इमां कोई खास बात थोड़ी ना हा....
स्वामी..फिर भी इतना चुप-चाप तुमका पहले नहीं देखा ना
अच्छा तुम भी जाना चाहत हो कैसे
हाँ बिलकुल मोटे......
तो फिर अपनी हाथ की कौनो दो अंगुलिओं को आपस में मसलना शुरु कर दो....अपने आप चुप हो जाओगे
स्वामी हाँ में हाँ मिलाता हुआ अंगुलिओं को आपस में मसलना शुरू कर दिया फिर ५ मिनट बाद झल्ला कर बोला निहायत बेकार का आईडिया है तुम्हार...इससे भला कोई चुप कैसे रहा सकता है...
मोटे थोडा मुस्कुराया फिर बोला रह सकता है
रहने दो तुम अपनी ई बेकार के नुस्खे........
हाउ.. पर स्वामी तुमने अंगुलिओं को आपस में मसलने से पहले उसे नाक के अन्दर डाला था की नहीं.....
ससुर तुम तो कमाल के हो कोई नहीं पहुँच सकता है तुम तक ....

'तेज' 

Thursday, September 2, 2010

वैशाखनंदन सम्मान

(आज मिला एक खुशी भरा ईमेल)

माननिय श्री तेज प्रताप सिंह जी
सादर अभिवादन
आपके द्वारा प्रतिभागी के बतौर दिये गये सहयोग के लिये हम आपके अतिशय आभारी हैं.
इस प्रतियोगिता में आपकी रचना को कांस्य सम्मान से नवाजा गया है. इस हेतु आपको
सुश्री सीमा गुप्ता की काव्यकृति विरह के रंग की प्रति भेजी जानी है. आपसे निवेदन है कि
लौटती मेल से आपका भारत का पोस्टल पता हमें भेजे जिससे आपको यह प्रति भिजवाई 
जा सके.
ऐसे आयोजनों के लिये भविष्य में भी आपके सहयोग के आकांक्षी रहेंगे.
आपके प्रमाणपत्र का कोड नीचे दे रहे हैं. 

सादर
वैशाखनंदन सम्मान कमेटी















वैशाखनंदन सम्मान कमेटी को मेरा धन्यवाद 
तेज प्रताप सिंह

Friday, August 20, 2010

सबसे छोटी जाति किशान

आप सभी लोगों से कभी न कभी ये जरूर पूछा गया होगा की आप क्या करते हैं या आप का बेटा क्या करता है. आज मोहन भी इस सवाल से बच नहीं पाया या यह कहिये की मोहन से जान बूझ कर ये सवाल पूछा गया. मोहन अपने एक मित्र रोहन की शादी में गया था. सभी अपने-अपने तरीके से शादी का आनन्द ले रहे थे तभी अचानक एक आवाज आयी...आरे भाई अन्दर आ जाईये वरमाला पड़ने वाली है. 
"यार मोहन चलो हम भी चलते हैं 
हाँ चलते हैं......"
यह कहकर मोहन अपने उस नए बने मित्र के साथ वरमाला मंच के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया.
दोनों ने वरमाला का रश्म निभाया फिर जाकर रोहन के घर वालों के साथ बातें करने लगे.
"रोहन बेटा इनसे मिलो ये हैं मिश्रा जी...जानते हो इनका बेटा डॉक्टर हो गया है.
ये तो बहुत अच्छी बात है..अब तो आप बहुत खुश होंगे..मोहन बोला 
हाँ भाई मेरे लड़के ने तो मेरा नाम रोशन कर दिया."
मोहन ने सहमती से सर हिलाया और फिर खाना लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद खाना लेकर जब वह लौटा तो वहां पर कुछ और लोग आकर खड़े हो गए थे.
नमस्ते अंकल..मोहन ने विनम्रता का परिचय दिया ????
हाँ नमस्ते बेटा कैसे हो.....!!!!
इतनी देर में रोहन भी वहां आ गया था...
भाई आप के बेटे ने तो वो काम किया है जो काबिले तारीफ है. आईएस बनना कोई मामूली बात तो नहीं हो सकती..
"बधाई हो बेटा......!!
हाँ इतना ही क्यों आप की बहू भी तो अब इंजीनियरिंग पूरा करेने वाली है.
सब आप लोगों की कृपा है...रोहन के पापा बोले"
मोहन भी सब की हाँ में हाँ मिला रहा था की तब तक किसी ने पूछ ही लिया 
"बेटा तुम क्या करते हो....??
थोडा चुप होते हुए बोला मैं तो..!!! कुछ नहीं घर पर ही खेती देखता हूँ.
अच्छा तो किसान हो"...कहीं से एक व्यंग्य भरी आवाज आयी.
"मोहन चुप रहा फिर बोला पता नहीं पर खेती करना मुझे अच्छा लगता है."
अब लोगों ने मोहन से थोडा बात करना कम कर दिया और धीरे-धीरे वहां से हटने लगे. 
उसको ऐसा लगने लगा जैसे अचानक वह अछूत हो गया हो. अब जादा देर मोहन से रुका न गया. मोहन तुरंत वहां से चल दिया पर वह इस बात को सोचता रहा की जब लोगों को यह पता था की मैं खेती करता हूँ तो फिर पूछा क्यों. 
जाति के आधार पर लोगों को बटते तो बहुत बार देखा था पर काम और नौकरी के आधार पर पहली बार ....वैसे भी हमारी जातियां काम के आधार पर ही बांटी गयी थीं पर आज आप इनका हाल तो देख ही रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब ये जातियां विलुप्त हो जाएगी और उनकी जगह नई जातियां आ जायेगी. तब आप को शायद मिश्रा जी, श्रीवास्तव जी, पंडित जी, ठाकुर जी कहकर न पुकारा जाये बल्कि डॉक्टर जी, इंजिनियर जी, मास्टर जी, पुलिश जी, वैज्ञानिक जी......कहकर पुकारा जाये और इनमें जो सबसे छोटी जाति होगी वो किशान होगी. 

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Sunday, August 15, 2010

मैं तिरंगा हूँ,

मैं तिरंगा हूँ,
कोई मिटा नहीं सकता मेरी हस्ती,
बाजुओं में अदम्य ताकत पाई है 
लहराता रहूँगा यूँ ही खुले आसमान में,
निर्भय, अविरल, निस्वार्थ भाव से
और करता रहूँगा सेवा लोकतंत्र की।

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


तेज प्रताप सिंह `तेज´


Friday, August 13, 2010

बटाई का धान

अन्दर से आवाज आई........

"अब तो खुश हो ना
हाँ काहे ना रही...तोका कोनो परेशानी है का
हाँ-हाँ अब तो खुश रहोगे ही..बटाई पर खेत जो मिल गाया है
भला हो राम सिंह का जिसने मुझे शहर में जाकर मजदूरी करने से बचाया"
स्वामी हर छमाही शहर जाता था और घर को चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता था पर इस बार राम सिंह ने उसे कुछ खेत बटाई पर देकर यहीं गाँव में रूककर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. पहले स्वामी थोडा सोंच में पड़ा पर अपनी धर्म पत्नी शोभा के समझाने से वह गाँव में रुक कर खेती करने के लिए तैयार हो गाया.
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 आज राम सिंह बहुत खुश था, होता क्यों नहीं लहलहाते धान के खेत उसकी ख़ुशी और मेहनत के गवाह थे.
"शोभा जानती हो!! धान बेचकर मैं क्या खरीदूंगा?
क्या, भला मैं भी तो जानू?
तेरे लिए गले का हार...मुझे तेरा खाली गला अच्छा नहीं लगता
रहने भी दो ये हार-वार, घर के छत से पानी टपक रहा है पहले वो बनवा लो....
हाँ वो भी बनवा दूंगा...
अच्छा-अच्छा ठीक है अब आकर खाना खा लो.."
स्वामी और शोभा दोनों आमने-सामने बैठकर एक ही थाली में खाने लगे. मन ही मन जैसे दोनों बातें कर रहे हों की फसल कटने के बाद पहले हम राम सिंह के पास जाकर उनका धन्यवाद देंगे की उनकी दया से ही अब हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. राम सिंह जैसा आदमी अगर हर गाँव में हो जाये तो ना जाने कितने मजदूर शहर जाने से बच जाएँ.
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काली रात थी..आसमान में बादल अपने उफान पर थे.
"शोभा ये बादल तो लग रहा है आज कुछ गुल खिला के ही जायेंगे
अच्छा है ना फसल में पानी लग जाएगा
ठीक बोल रही है तू..अब दरवाजा बंद कर दो सोने चलते हैं"
दोनों ने चादर अपने चेहरे पर डाली और सोने लगे लेकिन टपकती छत ने उनकी नीद तोड़ दी ...
"शोभा ये बादल गये नहीं अभी तक
हाँ लग रहा है सही में कुछ गुल खिला कर जाएँगे
बंद कर अपनी ये मनहूस आवाज...शुभ-शुभ बोल!!!"
दोनों के आँखों से नींद जा चुकी थी पर बादल अभी तक नहीं गये थे. एक-एक घडी कर के सुबह कब हो गयी दोनों को पता ही नहीं चला. अगले दिन तो वो कुछ बोलने लायक बचे ही नहीं.

जो फसल उनकी आँखों के सामने कल तक लहलहा रही थी, आज वह पानी में तैर रही थी, मानों इशारे से कह रही हो की मैं तुम्हारी जिंदगी में ख़ुशी ना ला सकी इसका मुझे बहुत दुःख है.
स्वामी के नशीब में तो जैसे शहर में जाकर मजदूरी करना ही लिखा है, बेकार में उसने थोड़ी दिन सपने देखे.
स्वामी ही क्यों और भी हैं जिनके सपने पानी में तैर रहे हैं और ना जाने कब तक तैरते रहेंगे.
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Saturday, August 7, 2010

लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं

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आज ही इंजीनियरिंग कॉलेज का रिजल्ट आया था....
"बेटा मनोज तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?
हाँ पापा लिस्ट में दूसरा नंबर है, अच्छा कॉलेज मिल जायेगा 
गुड, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ.
वो तुम्हारे दोस्त सोनू का क्या हुआ ?
पापा उसको शायद कोई कॉलेज ना मिल पाए उसके नंबर बहुत कम हैं.
चलो कोई बात नहीं अगली बार शायद उसे भी कुछ अच्छा मिल जाये."
अगले दिन मनोज कॉलेज में दाखिला लेने पहुंचा तो उसे वहां सोनू के पापा भी मिल गये.
"हाँ बेटा मनोज कैसे हो...कैसा चल रहा है सब कुछ.
मैं अच्छा हूँ ...कॉलेज में दाखिला लेने आया हूँ  
बधाई हो..
पर आप यहाँ कैसे?
हाँ.. मैं भी सोनू का दाखिला कराने आया हूँ"
मनोज को तो बात समझ में नहीं आई कि आखिर सोनू को कैसे दाखिला मिल सकता है.
यही सोचता हुआ वह सोनू के पापा को नमस्ते करके अन्दर दाखिले के लिए चला गाया.
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दाखिला लेकर मनोज जब घर वापस आया तो बहुत परेशान था ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने आप को कोश रहा हो कि इतना पढने का क्या फ़ायदा जब सोनू को बिना मेहनत किये दाखिला मिल रहा है. इतने में उसके पापा आ गये, उसको परेशान देखकर पूँछ पड़े क्या हुआ सब कुछ ठीक तो है ना. मनोज ने दुखी मन से सारी बात बताई.
ये तो गलत है..पर ये सब हुआ कैसे? कोई बात नहीं तुम इसकी चिन्ता मत करो और आगे के बारे में सोचो.
मनोज सहमती से सिर हिलाकर बाहर चला गाया.
अगले दिन मनोज घर से थोडा जल्दी निकला यह पता करने के लिए कि ये सब हुआ कैसे.
कुछ दोस्तों से मिलने के बाद जो उसे पता चला उससे तो वह और भी परेशान हो गाया. 
मनोज के लिए ये कोई छोटी बात नहीं थी कि पैसे देकर कोई इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला कैसे ले सकता है. वह मन ही मन में सोंच रहा था कि मैंने इतनी पढाई कि इस कॉलेज में दाखिला मिल जाये, दिन रात एक कर दिया पर जब लोग यहाँ पैसे से दाखिला ले रहे हैं तो ये कॉलेज अच्छा कैसे हो सकता है. मनोज ने मन में ठान ली कि वह अब इस कॉलेज से अपना नाम हटा कर किसी और कॉलेज में जायेगा जो शायद देखने में अच्छा ना हो पर सरस्वती कि पूजा करता हो.
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सोनू के पापा आज बहुत गर्व से कह रहे हैं कि मेरा बेटा बी टेक कर रहा है और किसी के बेटे से कम नहीं है. लेकिन इस गर्व के पीछे एक कडवा सच ये है कि अगर सोनू को अपने बल पर बी टेक करना होता तो आज भी वो घर में बैठा होता. पैसे में इतनी ताकत कहाँ से आ गयी जो आज लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं और देश में बने ना जाने कितने कॉलेज इन्हें बेच रहे हैं.
भ्रस्टाचार के लिए हम सरकार को कोसते हैं पर कभी अपने दामन को नहीं देखते. मुझे तो लग रहा है देश तो आगे बढ रहा है पर देश के लोग नहीं. 

                             खून वो नहीं जो सिर्फ अपने बाजुओं में बहे
                          कभी धरती पर भी एक कतरा गिरा कर देखो।।

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Thursday, August 5, 2010

मेहनताना

रानी के बाबू जी दो महीना पहले ही सेना कि सेवा पूरी कर के आये थे. हर समय उन्हें रानी की शादी और अधूरा बना घर चिंता में डुबा देती थी. सवाल ये उठता है कि क्या सेना में इतना भी मेहनताना नहीं मिलता कि वो अपना घर बनाकर बेटी कि शादी कर सकें? जो देश के लिए अपना सर लिए घुमते हैं उनके पास ही सर छूपाने के लिए जगह नहीं होती...सवाल बहुत छोड़ा है पर जवाब शायद किसी कि पास नहीं है.
चिंता के इन्हीं कारणों ने सूबेदार राम सिंह को जल्दी पैसा बनाने के लिए मजबूर किया और वो बिना सोचे समझे जिले में एक ६ महीने पहले खुली ट्रेडिंग कंपनी में पैसा लगा दिया. कंपनी शेर बाजार में पैसा लगा कर पैसा बनाती थी. राम सिंह ने अपनी जिंदगी कि बची-कुची पूँजी कंपनी में लगा कर इस बात का इंतज़ार करने लगे कि १ साल बाद उन्हें इसका दुगना मिल जायेगा और वो अपने सारे काम आसानी से पूरा कर सकेंगे.
राम सिंह ने रानी कि शादी खोजना भी शुरु कर दिया......
बाबू जी मैं शादी नहीं करुँगी..मुझे आप के साथ ही रहना है 
बेटी शादी तो करनी ही है, मुझे पता है कि तू मुझसे बहुत प्यार करती है पर मैं भी तो तुझसे उतना ही करता हूँ .
चलो बताओ इनमें से कोन सी फोटो तुम को सब से जादा पसंद है.
आप देख लो बाबू जी मुझे तो सब एक जैसे ही लगते हैं........!!!
हाँ अब तेरी पसंद भी तो देखनी पड़ेगी ना कि तुझे कौन पसंद है...अब अगर तेरी माँ आज हम लोगों के बीच होतीं तो ये फैसला भी उनके ऊपर छोड़ देते.. 
इतने में फ़ोन की घंटी बजी.....
हेलो...आप राम सिंह बोल रहे हैं 
हाँ कहिये .....
वो शादी के बारें में बात करनी थी, कल हम लोग लड़की से मिलने आ रहे हैं अगर आप को कोई एतराज ना हो तो.
अरे इसमें एतराज करने वाली कोन सी बात है....आप लोग कल आ सकते हैं 
रानी देखो कल तुमको एक लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम को कोई एतराज तो नहीं है.
नहीं बाबू जी ठीक है.............
......................................................................................................................................................................
सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी, लोग आ चुके थे रानी को देखने. लड़के वालों ने सबसे पहले लड़की से मिलने की इच्छा जताई, रानी का जैसे कमरे में प्रवेश हुआ सबकी आँखे उसके चेहरे की और दौड़ पड़ीं. रानी सचमुच रूप की रानी थी कोई भी अपनी नजर ना हटा सका उसके चेहरे से, ऐसा लगा जैसे रानी किसी बच्चे की मासूमियत छुपाये शर्म के पालने में झूल रही हो.
रानी एक ही नजर में सबको पसंद आ गयी.....
अगले ही पल लड़के के माँ ने पूछा मेरा बेटा कैसा लगा?
रानी ने हाँ कर दिया.........अब क्या था जैसे ही रानी ने हाँ कहा शादी के बात पक्की होने लगी.
राम सिंह ने भगवान को धन्यवाद दिया और दिवार पर लगी रानी के माँ की तस्वीर देखने लगे.
थोड़ी देर बाद लड़के वाले अपने घर आने का नेवता देकर वापस चले गये.
रात के ९ बजे थे की राम सिंह का फ़ोन एक बार फिर बजा....
हेलो..मैं राहुल बोल रहा हूँ 
कौन राहुल????
वही जिसने आप का पैसा ट्रेडिंग कंपनी में लगवाया था.
हाँ...क्या हुआ ?
एक बुरी खबर है ......कंपनी भाग गयी 
क्या....होश में तो हो की तुम क्या कह रहे हो.
हाँ मैं सच बोले रहा हूँ........
राम सिंह के पैर के नीचे से जमीन खिसकी और वह धडाम से गिर पड़ा 
रानी को कुछ समझ में नहीं आया की अचानक क्या हो गया...दौड़ कर अन्दर से पानी लायी और राम सिंह को पिलाने लगी.
राम सिंह थोडा समहला और एक लम्बी गहरी साँस लेकर रानी को सब कुछ बता दिया. रानी भी पहले थोडा दुखी हुई पर अगले ही पल हंसकर बोली कोई बात नहीं बाबू जी हम फिर कमा लेंगे. इससे जादा रानी क्या बोलती उसे भी पता था की अब बहुत सारी परेशानिया एक साथ आने वाली थीं जिसमें उसकी शादी भी थी.
.......................................................................................................................................................................
इस भीड़ में सिर्फ राम सिंह ही नहीं था और भी बहुत से लोग थे जिनके सपने टूटे थे. राम सिंह अब अपनी किश्मत कोसता हा फिर सरकार जिसको हम चुनकर भेजते हैं. अब राम सिंह भी क्या करता काफी बड़े लोगों का नाम जुड़े होने के कारण जिसमें जिले के बड़े नेता और पोलिश महकमे के लोग भी थे, उसके कंपनी पर जल्दी विश्वास करने का कारण बनी थी.
राम सिंह मन ही मन सोंच रहा था कि इस देश की सरकार कब सुधरेगी और कब ऐसे लोगों पर लगाम कसेगी जो अपनी मनमानी करते फिर रहे हैं. 
राम सिंह देश के बाहर के दुश्मनों से तो जंग जीत गाया था पर देश के अन्दर हार गाया.

तेज प्रताप सिंह `तेज` 

Tuesday, August 3, 2010

मंजिल

हर एक पल को जियो जी भर के
सपनों पर अपनी लगाम नहीं होती,
आने वाले कल को देख लो आज
पीछे देखना विजेता की पहचान नहीं होती।

गर्व से सर उठा कर चलो
हीरे की कोई पहचान नहीं होती,
जीत जाओगे जीवन के इस शफर में
बिना उड़े परिंदे की पहचान नहीं होती।

मुश्किलों से तुम घबराना नहीं
किस्मत किसी की गुलाम नहीं होती,
जब तक गिरकर उठ ना जाओ
मंजिल की सही पहचान नहीं होती।

Sunday, August 1, 2010

मेरी बात

बहुत दिनों से मैं आप लोगों से दूर रहा इसका मुझे खेद है.
बताते चलें की आज से मैंने एक नया ब्लॉग शुरु किया है जिसपर सिर्फ मेरी कुछ अनमोल कहानियां होंगी.
कृपया जरूर आयें इसपर
आप का प्यार मिलता रहे बस और क्या.........
 http://tejpsinghji.blogspot.com/

तेज

आया हूँ आज तो कुछ लिख के जाऊंगा

आया हूँ आज तो कुछ लिख के जाऊंगा 
यादों को शब्दों में पिरो के जाऊंगा
भूल ना जाऊं उनके चेहरे की तासीर 
इसलिए महफ़िल को आज जगा के जाऊंगा ।

बजा दो तालियाँ मेरे इन शब्दों पर 
पी लो मुहब्बत के दो चार घूँट
आया हूँ आज मैं बहुत दिन बाद
तो प्रेम में डुबकी लगवा के जाऊंगा ।

टूटे दिल में आश जगाने की खाई है कशम
उजड़े प्यार को बसाने की ठानी है मैंने 
उदास चेहरे पर आ जाये फिर से मुस्कुराहट  
इसलिए दिल में एक और गुदगुदी उठा के जाऊंगा ।

महबूब की दोनों आँखों में डूब जाओ
भुला दो दूनिया की ग़मों रंजिश 
भीग जाये तेरा तन मन उनके प्रेम में 
इसलिए आज मुहब्बत की बारिश करा के जाऊंगा ।

तेज 

Tuesday, June 8, 2010

माँ बापू कहिन रहा हम तोका, दुलहा तोहरे पसंद का देबे.....'तेज'

माँ बापू कहिन रहा हम तोका, दुलहा तोहरे पसंद का देबे।
तोहरे खुसी मां हम अपना, तन-मन न्योछावर कर देबे ।।

दिन तो अब पहाड़ लागत है 
रात सुबह खातिर रोवत है
दिल-तराजू में तौले बिना उनका 
प्यार अपनी कीमत वसूलत है।

मान राखेन हम समाज-परिवार का 
पाथर रखकर तराजू में दिल हम तौलेन
खुशियाँ बनी रहे उनके उदास चेहरे पर 
यही खातिर हम माँ बापू का कहा मानेन।

किस्मत का लिखा कौन मिटा सकत
जीजा जेका हम कहत रहेन
दिदी के मरन के २ महिना बाद
हम उनही से ब्याह रचा लिहेन।

माँ बापू कहिन रहा हम तोका, दुलहा तोहरे पसंद का देबे।
तोहरे खुसी मां हम अपना, तन-मन न्योछावर कर देबे ।।










'तेज'

Friday, June 4, 2010

सफेदी............'तेज'

दिल में लगे खरोंचों को 
यादों में जिन्दा दागों को
सिराहने पड़े सपनों को
पोंछ दो मेरी इस सफेदी में 

लम्बी होती इन दोपहरी को  
सामने लिखी उधारी को 
उनकी दी हुई हर निशानी को 
पोंछ दो मेरी इस सफेदी में

अब ना आयेंगे वो दुबारा 
इन सफेदी में सिन्दूर भरने 
ना ही मेरी भूरी आँखों में 
अपनी सूरत दिन-रात देखने  

'तेज'
(चित्र साभार गूगल)

Sunday, May 30, 2010

स्लोवीनिया और ऑस्ट्रिया के जंगलों के कुछ चित्र......... तेज

समय के अभाव में आने में थोडा विलम्ब हुआ....पर चलिए जब आया ही हूँ, तो आप को 
पिछले दिनों में स्लोवीनिया और ऑस्ट्रिया के जंगलों के कुछ चित्र दिखा देता हूँ.

 तेज                                      

Thursday, May 20, 2010

स्वामी प्रेम .................'तेज'

छोड़ मेरा संग
प्रिये गये कहाँ
विरह की अग्नि में
तन-मन भस्म यहाँ।

गृह स्वामी दर्शन में 
मृग नयन पथरायी
हर्दय में शेष कंपन
मिलन मात्र बवरायी।

त्याग परदेश प्रेम
चरण धरो गृह चौखटा
जो बना है बिना हरण
रावण अशोक वाटिका ।


'तेज'
 

Wednesday, May 19, 2010

हिन्दी साहित्य के नाम पर हिन्दी, उर्दू, फारशी, और इंग्लिश की खिचड़ी परोस रहे हैं ब्लॉगर.....'तेज'

कुछ कारण बिना किसी कारण होते हैं पर जब कारण आवश्यकता से आगे निकल जाये तो उसका बोध कराना आवश्यक होता है.
कुछ ऐसा ही हो रहा है ब्लोगवाणी पर, कुछ अच्छे लोगों को छोड़ कर शेष लोग केवल संख्या बढाने के लिए ब्लोगिंग कर रहे हैं.
मैं स्वयं को भी हिन्दी का देवता नहीं समझता पर जो लोग अच्छा लिख रहे हैं, कम से कम वो तो ऐसा ना करें.
किसी को कुछ बुरा लगा हो तो क्षमा. 
'तेज'

Saturday, May 15, 2010

चिअर्स को हिन्दी में क्या कहेंगे..........'तेज'. ...

"Cheers" चिअर्स को हिन्दी में क्या कहेंगे.....
आसान सा सवाल है पर मैं फँस गाया इस चिअर्स के चक्कर में. हुआ ये की मैं कुछ अंग्रेज दोस्तों के साथ रात का खाना खाने बाहर गाया. लोगों ने झट से सोमरस (बियर ) का आर्डर कर दिया. अब क्या था कहने की देर थी की सोमरस सामने थी. लोगों ने हाला को हाथ से छुआ फिर बोले प्रोस्ट "prost" (चिअर्स को जर्मन में). लोंगों ने एक घूँट ही पिया था की मेरे तरफ देख कर बोले, इंडिया में प्रोस्ट को क्या कहते हैं. मुझे तो जैसे सांप ही सूंघ गाया हो, फिर इज्जत बचाने के लिए एकदम से बोल दिया "मस्त", अब आप ही बतायें मरता तो क्या ना करता. भाई साहब "मस्त" ने फिर जाम को ऐसे छुआ की आज तक हर देवाले में जब वो अंग्रेज मेरे साथ होते हैं तो  "मस्त-मस्त" करते हैं.

जाम से जाम टकराता हर अंग्रेज पीनेवाला,
मस्त-मस्त कहकर घूँट पे घूँट पीता मतवाला,  
अब क्यों खुश ना हो मेरी चंचल साकी बाला,
जब फर्क मिटाती अंग्रेजी हिन्दी "मस्त", देवाला

तब से आज तक यही बात सोंच रहा हूँ आखिर "Cheers" चेअर्स को हिन्दी में क्या कहेंगे.....
कृपया करके सुझाव दें...
तेज प्रताप सिंह 'तेज'.

Wednesday, May 12, 2010

हवा कुछ कहने आई है .........`तेज`

कहीं किसी बंजर मैदान से,
कुछ पूराने वृछों से हवा बह आई है 
अकेले पड़े शमशान के कब्र से,
आजादी की सुगंध संग लेकर आई है
हवा कुछ कहने आई है ।।

जो भूल गये हैं कीमत आजादी की, 
उनको लम्बी नींद से जगाने आई है
पूराने पड़ चुके सोये जंगी हथियारों में,  
फिर से आजादी का जोश जगाने आई है
हवा कुछ कहने आई है ।। 
 
काटा था सर फिरंगी का जिसने,
उस जंगे-तलवार का दर्द गिनाने आई है
कमजोर बैठे कबूतरों को उड़ाने,
खूंखार आजादी के बाज जगाने आई है 
हवा कुछ कहने आई है ।। 

कब्र में पड़े शेरों के सपनों का भारत,
आज हमारे हवाले करने आई है
खाली पड़े बंजर मैदान से,
सूखे वृछ उखाड़ नये लगाने आई है
हवा कुछ कहने आई है।।

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Saturday, May 8, 2010

हरिवंश राय बच्चन जी को समर्पित "प्रियतम की बाला"........'तेज'

प्रिय की अधर रस में भीगी माला,
अपने ही सृंगार में डूबती छाला,
रंग रूप के आवेग में समाती बाला,
मृद मधुर मिलन करने आती नित्य देवाला।।9।

बार-बार मद-मस्त आता पीनेवाला,
छल से छलकती घूँट में जीता जीनेवाला,
छलकते प्याले को होंठो से पोंछती बाला,
दर्शन आश में प्याले पर प्याला पीती, देवाला।।10।

कल्पना के भंवर में उमड़ती इन्द्र-माला,
सुन्दर अंगूरी रस में खोई अप्सरा मधुबाला,
एक बूंद जो गिरे स्वर्ग से, अमर हो जाये बाला,
भूल जाये विरह और ना जाये दुबारा, देवला।।11।

निलांगु होंठ हुए प्रिये-प्रीतम चूमते मीत-माला,
मर्यादा में राम, रास-लीला में कृष्ण-राधा,
धन्य हो जाये जो धरा, आज तेरे प्रेम से बाला,
ना लेगा अवतार फिर और एक, देवाला।।12।

अंगूरी पुष्प पर मंडराता भौंरा पीनेवाला,
जीवन की गहराई, प्याले में नापता मतवाला,
जब उतरी प्रिये के आँखों में मेरी चंचल बाला,
लगता हर प्याला उसे खाली, फीकी, देवाला।।13।











Conti..
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Thursday, May 6, 2010

बाला...नये रूप में.......`तेज`

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है.
"बाला" जो की यहाँ "मन" के रूप में होगी, "मधुशाला" "देवाला" और "हाला" "माला" के रूप में. मैंने "बाला" पर जादा जोर दिया है, की वह क्यों देवाला जाती है.

सुख संचित कर हंसती-खिलखिलाती,
जीवन के रंग को जीती-सहलाती,
दुःख में पाँव पसार सोती बाला,
मिलती उसे जब देवाला की माला।।1।

अँधेरी तरंगो के भीगे नीले नभ में,
भंवर की सिमटती लम्बी गहराई में,
जीवन की अटखेलियाँ करती बाला,
आती जब वह भुलाने दुःख, देवाला।।2।

सपनों की गहराई में दिन-रात खोई,
हाथों में माला लिए सुख की, रातों रोई, 
इससे अच्छा नहीं कोई शिवाला, कहती बाला 
जहाँ पराये लगते भाई, आती जब देवाला।।3।

दूनिया के दर्द से जब थक जाती,
भीड़ के थपेड़ों में जब खो जाती,
रिश्तों में जब कभी अकेली होती बाला,
अपनों से तब मिलने आती वह देवाला।।4।

कुछ करने की भड़ास में जब रह जाती,
रिशवत के चंगुल में जब फंस जाती,
बड़े सपनों के बोझ में जब दब जाती बाला,
पूरा करने तब अरमान सारे आती वह देवाला।।5।

विधवा की जवानी, गद्दार की देश भक्ति से,
राजनीति के गंदे रंग, आतंकवाद की शक्ति से,
जब खिन्न हो जाती चंचल अलबेली बाला,
आती नई सुबह के इंतज़ार में लेने माला, देवाला।।6।

महबूब की मीठी सुनहरी बीती याद में,
सुन्दर बालाओं और मिलन की आश में, 
भरे प्याले की कलकल गहराई में, बाला
जीवन खोजने आती, लेने माला, देवाला।।7।

नेता-भ्रस्टाचार के भरोसे छोड़ देस-ईमान,
मंदिर-मस्जिद में छोड़ भगवान-अल्ला,
रामायण-कुरान में छोड़ राम-रहीम, बाला 
आती क्यों करने अपमान, पहन माला, देवाला।।8। 
Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Tuesday, May 4, 2010

देवाला की माला....

(2)
अँधेरी तरंगो के नीले नभ में
भंवर की सिमटती गहराई में 
सुलगती आग की लपट में
अटखेलियाँ करती बाला....
विधवा की जवानी 
गद्दार की देश भक्ति 
राजनीति के गंदे रंग
और आतंकवाद की शक्ति 
से खिन्न होकर आती बाला 
डालने देवाला के माला....
महबूब की मीठी याद में
मिलन की सुन्दर आश में 
थिरकती सुन्दर बालाओं में 
जीवन खोजने आती बाला 
लेने देवाला की माला....
Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Monday, May 3, 2010

बाला......

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है.
बाला जो की यहाँ मन के रूप में होगी, मधुशाला देवाला और हाला माला के रूप में.

(1)
सुख संचित कर हंसती बाला,
जीवन के रंग को जीती बाला
दुःख में पाँव पसार सोती बाला,
मिलती उसे जब देवाला की माला

दूनिया के दर्द से जब थक जाती बाला,
भीड़ के थपेड़ों में जब खो जाती बाला,
रिश्तों में जब कभी अकेली होती बाला 
अपनों से तब मिलने आती वह देवाला  

कुछ करने की भड़ास में जब रह जाती बाला 
रिशवत के चंगुल में जब फंस जाती बाला
बड़े सपनों के बोझ में जब दब जाती बाला
पूरा करने तब अरमान सारे आती वह देवाला  

Conti...
तेज प्रताप सिंह `तेज`

Friday, April 30, 2010

मैं था जिनके इंतज़ार में............

मैं था जिनके इंतज़ार में
ख़्वाबों का दिया जलाये 
हो गए वो किसी और के 
बिना अश्कों में आग लगाये....
सावन की बूंदों में गिरता रहा
मेरा ये अश्क लहू बनके
मुस्कुराते रहे वो उनकी बाँहों में
बिना शर्मों-हया शाजाये......
बैठा रहा मैं उनकी आश में, 
मिलन की शमा जलाये
और वो चले गए मंदिर से, 
बिना चौखट पर मत्था टिकाये....













 तेज प्रताप सिंह 'तेज'  
(चित्र साभार गूगल)

Tuesday, April 27, 2010

फहरा दो पताका............

जिंदगी के सवालों से परेशान 
बहुत हो गाया, अब और नहीं 
इस बार बदल कर रहूँगा 
अपनी किस्मत.......
लडूंगा हर कठिनाईयों से
हिमालय के शिखर तक पहुचूँगा 
सारे बंधन तोड़ दूंगा....
चाहे कुछ भी हो जाये
इस बार बदल कर रहूँगा 
फिर धीरे से समझाता है 
अपने को....
ये नहीं मेरी बस की बात 
मैं नहीं बदल सकता
अपनी किस्मत.......
ये सब है ऊँचे महलों वालों की बात
मैं तो ठहरा छोटा सीधा इन्सान 
भूल गाया वह 
किस्मत नहीं किसी की गुलाम 
सबको देती है मौका एक बार 
इसलिए हे किस्मत को कोसने वालों
अब और देर मत करो 
उठो हरहराकर, तोड़ दो सबके भ्रम
कूद पड़ो पल हर पल की जंग में
फहरा दो पताका जीत का
जिंदगी के इस रथ पर....

तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Monday, April 26, 2010

कहीं किसी सड़क पर...........

दिन प्रतिदिन की भीड़ में 
कहीं किसी सड़क पर
चिलचिलाती धूप में नगें पैर 
दौड़ती इधर-उधर.....
कभी हिस्से में मिलती नई 
तो कभी डामर से लतफत सड़क 
देखती एक टक चलते लोगों को 
तलाशती कोई अपना इन बदलते 
लगों में चलती सड़क पर
दुःख ने छोड़ा ना उसका साथ
बचपन में मिला क्यों अभिशाप 
मिलता दिन-प्रतिदिन अवसाद
आज फिर से.....
आँखों में रात की गहराती नींद
सोई नहीं अवसाद के डर से 
निहार रही वह..... 
आते जाते लोगों की भीड़ 
निकले इधर से आज कोई अपना 
नहीं तो देके जाये
दो पैसा भीख

Sunday, April 25, 2010

घाव से भरा पत्र.........................

दर्द और यादों का समेटा है
हर पल का लुटता सवेरा है
घाव से भरा पत्र.... 
जो उसने आज माँ को भेजा है

निकालो मुझे इस अन्धकार से बाहर 
की सवेरा भी अब मुंह छिपाने लगा है
मैं और जिन्दा रह नहीं सकती 
बिना वजह आसुओं के घूँट 
पी नहीं सकती.....
बाबा को जल्दी भेजो यहाँ 
उनकी लाडली जिन्दा रहते अब और 
मर नहीं सकती.....
अरमानो के झूले पर अभी है उड़ना मुझे 
की इतनी जल्दी मैं एक ढेला जहर का 
खा नहीं सकती.....

एक-एक करके बिक रहे हैं सारे सपने 
जिंदगी का दिया भी अब बुझने लगा है
इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं माँ की 
दहेज का तेल अब चुकने लगा है........

तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Wednesday, April 21, 2010

ये थीसिस अगर मिल भी जाये तो क्या है..!!

ये पेपर.. ये जर्नल.. ये रिसर्च की दुनिया
ये बालों की दुश्मन कीताबों की दुनिया
ये पब्लीकेशन की भूखी लोगों की दुनिया 

 ये दुनिया अगर मील भी जाये तो क्या है...!!
हर एक स्कॉलर घायल.. है रूह उसकी प्यासी..
नीगाहो में उलझन दिलों में उदासी
ये लेब है या आलम बद-हबासी
ये अनालिसीस अगर हो भी जाये तो क्या है..!!

यहाँ बस चपरासी है हर स्कॉलर की हस्ती..
ये बस्ती है बस बूड़े प्रोफेसर्स की बस्ती..
स्कॉलर्स की जवानी है उनके बुडापे से सस्ती..
ये एक्सपेरिमेंट अगर हो भी जाये तो क्या है..!!

लड़का भटकता है बेकार बन कर...
लड़की के पेपर छपते है एहसान बन कर...
रिसर्च यहाँ होती है व्यापार बन कर...
ये रिसर्च अगर हो भी जाये तो क्या है...!!

ये दुनिया जहाँ दिमाग कुछ नहीं है
पेपर के आगे दोस्ती कुछ नहीं है..
वफ़ा कुछ नहीं प्यार कुछ नहीं है..
ये पेपर अगर छप भी जाये तो क्या है..!!
जला दो इसे फूंक डालो ये जर्नल
मेरे सामने से हटा लो ये थीसिस
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये लैब
ये थीसिस अगर मिल भी जाये तो क्या है..!!
(एक मित्र ने ईमेल से भेजा)

Tuesday, April 20, 2010

रेलगाड़ी से उतरना मना है...यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है

रेलगाड़ी से उतरना मना है यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, चलिए थोडा और आगे चलते हैं.
(9)
यार मोटे उ रामखेलावन का क्या हाल चाल है
छोड़ा पूराने, अब हमार उनसे ना पटत है...
काहे का हो गाया...
बस ऐसे ही, कोई खास बात ना बा...फिर भी 
अरे उ ससुर रामखेलावन का जोन लड़का बा बहुत सेखी मारत रहा...
का हुआ...अरे कछु अंग्रेजी का जान गा है..हमेशा भाव मारत रहत है 
जब देखो तब कुछ ना कुछ अंग्रेजी मां बोल कई, हंसी उडावत है..अब हमका तो इतना आवत ना
हाँ ई तो गलत है, बड़ों का ध्यान रखना था उका....पर हुआ का ?
अरे एक दिन उ कुछ अंग्रेजी मां बोलिस हमका ना बुझिल..तो हम उ से बोला..
जानित है तू बड़का अंग्रेज हो..पर जोन हम कही उका तू अंग्रेजी मां बोल कय देखाव तो मानी..
हाँ, तो का पूछे उससे..पूराने बोला
हाँ मैंने पूछा...
झपट झंझला झूम झट झाम झूम झकझोर
दांव पेंच करने लगे दोनों-दोनों ओर
ईका अंग्रेजी मां अनुवाद करो....
अरे मोटे तू तो जान मार दिहो...कुछ बोला फिर वह....
ना दुबारा ससुर नजर नहीं आवा...तबसे हमार उनके घर से थोडा अनबन है
उनके घर वाले कहत हैं की तोका हमरे लड़का से जलन है...
मारो ससुर का, जैसे को तैसा...सही कहा पूराने 
(10)
मोबाइल का बुखार इस कदर लोगों में लगा की हर किसी ने इसे ख़रीदा. स्वामी से भी रहा नहीं गाया...
दीदी तेरा देवर दिवाना ...हाय राम कुड़ियों को डाले दाना.......
ये गाना कहाँ से आवत है...अरे रुका मोटे ई हमरे संचार यन्त्र की आवाज है
संचार यन्त्र......ई कौन सी बला है.......
अरे उ हमरा मोबाइल..अभी निकालत हूँ उ का झोला से..
अम्मा बोल पड़ीं, कितने का ख़रीदा...
अरे ससुर को पूरे १२०० में लिया है...मस्त चीज है 
अच्छा जब खरीद ही लिया है तो अब लो एक नंबर मिलाओ हमरे घर 
कोई जरुरी बात है तो बोलो..ससुर मां अभी खाली ५ मिनट बचा है 
हाँ..मिलाओ जरुरी है...पर अम्मा देख लो खाली ५ मिनट है
मिला ना...लो फिर मिलाता हूँ ....
हलू कौन बोलत हो, हम अम्मा बोल रही हूँ.......
अरे अम्मा हाँ का हाल है, आप आश्रम कब आयीं
....हाँ हम स्वामी के मोबाइल से बोल रही हूँ.....?   
स्वामी के मोबाइल से!!!...जय हो स्वामी जी...  
तो आपकी नित्यानंद स्वामी जी से कब मुलाकात हुई...
आज कल तो हमारी उनको कोई याद भी नहीं आती...आप ही लोगों में लीन रहते हैं 
अरे उ स्वामी नाहीं...स्वामी...गाँव वाला 
का अम्मा यंत्र हमका दो...हम बात करीत है 
हाँ..आप कौन...स्वामी ने पुछा
हाँ, अच्छा..नमस्कार..इतने में मोबाइल कट गाया 
देखा..बोलेन रहा ५ मिनट बचा है....जब बात करेक नाहीं आवत तो काहे हमेशा...????
गलत नंबर मिल गवा रहा का..अम्मा बोली 
स्वामी...हाँ, कोई आश्रम का नंबर था....
सब तेरे नाम के कारण हुआ है, ना तेरा नाम स्वामी होता ना देर तक बात होती
अब तो सारी गलती हमरे नाम की ही है....स्वामी झल्ला कर बोला  
Conti....
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Monday, April 19, 2010

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक और उड़न तश्तरी के अनुरोध पर यात्रा जारी है ....

चलिए यात्रा को और आगे बढ़ाते हैं ...फिर से थोडा गुदगुदाते हैं....
(7)
गर्मी ने लोगों को इसकदर परेशान कर रखा था की लोग या तो ऊपर बंद पड़े पंखे को देखते या फिर पसीना पोछते...
इतने में डिब्बे में प्रवेश हुआ एक दुबले पतले आदमी का जो हाथ का पंखा बेंच रहा था.
लिजीये पंखा जो देता है हवा बिना करंट का....सिर्फ ५ बचें है, जल्दी करिए 
मोटे ने उस आदमी को ऊपर से नीचे तक देखा..फिर बोला तुम भी दूसरों की तरहं ठग तो नहीं हो..?
ना बाबू ..बिलकुल टिकाऊ माल बेचता हूँ मैं..
चल तो फिर एक पंखा निकाल..कितने का है ?
बाबू २० रुपये का है 
क्या बात करता है, इतना महंगा..हमारे यहाँ तो २० में दो मिल जाते   
ठीक है बाबू तो आप वहीँ से ले लेना....
अरे रुक ला एक दे...मोटे ने २० का नोट थमाया 
लेकिन बाबू एक बिनती है 
उ का ...जब तक हम ना कही पंखा ना चलाना, मैं अभी ५ मिनट में आता हूँ तब बताऊंगा पंखा कैसे चलाना है.
क्यों ईमां कोई खाश बात है का...हाँ है ना, इतना कहके वो चला गाया 
मोटे से रहा ना गाया और उसने पंखा चला दिया..इधर चलाने की देर थी की पंखा दो टुकड़ों में बट गाया 
ये देखो ससुर २० रुपये का पंखा २० मिनट भी ना चला..मोटे चिल्ला पड़ा 
सब उसकी तरफ देखने लगे, इतने में पंखे वाला आदमी भी आ गाया 
का हुआ बाबू!!! पंखा दो हम चलाना बताते हैं
ससुर तुम बोले रहो की तुम ठग ना हो फिर ये पंखा...
हाँ बाबू पर आप पंखा चला काहे दिहो 
ससुर ईमां कोई विद्या लागत है का जोन हम ना चला सकित रहा..आओ भाई तुम्ही बताओ कैसे चलावत हैं 
पंखे वाले ने एक हाथ में पंखा पकड़ा फिर बोला...
ई पंखा हाथ से सीधे पकड़ो और उसके सामने मुहं को घुमाओं..दायें-बायें 
हाय रे दादा..ई तो कमाल का पंखा बेंच रहा है...तुम तो सबके बाप निकले 
बाबू देखो ई आप की गलती रही हमरा नाहीं..
अच्छा अब तुम भी निकल लो यहाँ से, लगता है सारे अजूबे इसी ट्रेन में आ गए हैं...पूराने बोला 
ससुर आज का दिन ही खराब है, कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है....मोटे दुःख भरी आवाज में बोला
(8)  
अम्मा तोहरे बिटिया की शादी का का हुआ 
हाँ..पूराने मिला है एक लड़का सोच रहीं हूँ अगले साल शादी कर दूँ बिटिया की...
लड़का करता क्या है..कुछ पता है 
हाँ उन लोगों ने बोला है की लड़का टिम्बर मर्चेंट की दूकान चलाता है
तब तो बढ़िया कमाता होगा..पर दूकान में क्या है, कुर्सी, अलमारी, पलंग या सब 
नाहीं पूराने ई सब ना है 
तो क्या है कच्ची लकड़ी बेचता है क्या.....
ना ई सब भी ना बा 
तो क्या ठेका लेता है लकड़ी का..कुछ तो पता होगा ना 
ना ई सब भी नाहीं करत है 
पूराने थोडा दूसरे आवाज में बोला, तो क्या हरे पेंड लगवाता है क्या....
नाहीं ये भी नहीं...अरे तो करता क्या है 
वो...वो बस स्टैंड पर दातून बेचता है 
ससुर..के ये बात बोले मं इतनी देर....
अब का करी पूराने इज्ज़त देखे का पडत है ना 
अरे तो ई पहले देखना था अब क्या फ़ायदा ....
अम्मा चुप हो गयी और इधर-उधर देखने लगी 
Conti...
तेज प्रताप सिंह

Sunday, April 18, 2010

चलिए यात्रा आगे शुरु करते हैं ..

चलिए यात्रा आगे शुरु करते हैं ..
(5)
दे दे बाबा भूखे को कुछ दे दे. जोड़ी सलामत रहे. दो दिन से कुछ खाया नहीं..दे बाबा 
यार मोटे अब ये कौन सी बला आ गयी. ससुर चैन से साँस भी नहीं लेने देवत.
हाँ...ससुर जैयेसे झपकी लागत है कोई ना कोई टपक परत है.
सही कहत हो पूराने ससुर जीना हराम कर दिया है.......
साहब आपकी जेब सलामत रहे..किसी की नजर ना लगे ...दो दिन से कुछ खाया नहीं 
भाग यहाँ से क्यों मेरा जान खा रह है ...किसी और को पकड़ 
दे दे ना १ रुपये ...इतने में का चला जाइए तहार...अम्मा बोली...
पूराने ने जेब में हाथ डाला ५० का नोट था..टूटा नहीं है मेरे पास..
कितना है साहब दे दो हम टूटा करे देत हैं...१००, ५० कितने का नोट है 
ई देखो ससुर ५० का टूटा भी है इसके पास, भाई भीख तो हमको मांगनी चाहिए 
हाँ पूराने ससुर के पास तुमसे जादा नोट है..टूटा भी दे रहा है तुमको 
साहब गुस्सा काहे होत हो, ई सब हमरे मेहनत की कमाई है....
मेहनत की कमाई बतावत हो तुम ईका. ससुर हमरी कमाई तेरी मेहनत कैसे हुई 
ठीक साहब ना देना हो तो ना दो पर उल्टा-सीधा सुनने की हमार आदत ना है 
छोड़ जाने दे मुहं ना लग इनके, अम्मा बोली 
अगले पल भिखारी चलता बना......
और एक बार फिर लोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे
(6)
अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी कुछ लोग और चढ़ गए 
भाई साहब थोडा जगह देना बैठने को, अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगा 
अरे कहीं और देख लो यहाँ पहले से ही चार लोग बैठे है...स्वामी बोला 
लेकिन मुझे तो तीन ही दिख रहे हैं, आप तो चार बता रहे हो 
हाँ गाया है ना एक पानी लेने अभी आता होगा 
ठीक है जब वो आयेगा, मैं उठ जाऊंगा.......
काहे जिद करत हो कहित है ना कहीं और देख लो 
ये तो हद कर दी है आप ने लगता है चारों लोगों ने मिलकर पूरी ट्रेन खरीद ली है 
अब बहुत हो गाया..चलते बनो वरना....वरना क्या, क्या कर लोगे 
तब तक मोटे पानी लेकर आ गाया. देखो हैं ना चार, आँख फाड़ कर देख लो...
हाँ-हाँ ठीक है, पता है तुम राजा हरिस्चंद्र की औलाद हो..यह कहकर वो चलता बना 
मोटे बैठ कर पानी पिने लगा..तभी स्वामी चिल्लाया हाउ मेरी जेब कट गयी....
का कहत हो जेब कट गयी..हाँ लगता है वही आदमी ले गाया मेरी जेब 
वो देख बाहर ससुर उन भिखारियों के साथ खड़ा है....
अब बुझिल हमका काहे उ भिखारी कहिस रहा 
साहब आपकी जेब सलामत रहे..किसी की नजर ना लगे.....
ई रहा उ का प्लान, लई गाया तेरा जेब...कितना गवा 
१०० का नोट झटक कर लई गवा.....
सत्यानास हो उनका सब लूटे मां लगे हैं..अम्मा बोली 
Conti....
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Saturday, April 17, 2010

यात्रा जारी है .(हास्य)........खुसखबरी के साथ

आज मैं आप को पहले एक खुसखबरी देता हूँ...हाल ही में मुझे मेडिकल यूनिवेर्सिटी द्वारा शोध के लिए बेस्ट पोस्टर अवार्ड मिला था और अब The Jouranl of Immunology ने एक दूसरे शोध को शोध पत्र के रूम में छापने के लिए स्वीकार कर लिया......
(अंग्रेजी के शब्दों के लिए छमा).
आप सब का आशीर्वाद बना रहे यही मेरी कामना.
चलिए अब रेलगाड़ी की यात्रा शुरु करते हैं
(3)
कुछ देर बाद ट्रेन अगले स्टेशन पर जा कर रुक गयी. यात्री ट्रेन में चड़ने लगे जिसमें कुछ हिजड़े भी थे.
एक हिजड़ा पूराने के पास पहुँच गाया.....
अरे ये शारुख खान देता है पैसे की नहीं...ला दे दे चिकने...ला
भाग यहाँ से, मेरे पास नहीं हैं...
देता है या दिखाऊँ महाभारत......?????
अरे दे दे १० का नोट नहीं तो तू अभी गंगा नहा लेगा...मोटे बोला
ये देखो आमिर खान भी बोला, चल तू भी निकाल १० का नोट..हिजड़े नें मोटे के चेहरे पर हाथ फिराते हुए बोला.
इतने में अम्मा ने १० का नोट निकाल कर हिजड़े को थमा दिया....हिजड़ा चलता बना
ई देखो बढ़िया धंधा है....कमा लिया झट से १० का नोट..कोई काम भी नहीं करना पड़ा, स्वामी असहज होकर बोला.
हाँ तो अगली बार जब पैदा होना तो तू भी हिजड़ा बन जाना और छक्के पर छक्का मारना.
अम्मा बोली... काहे मोटे बिना वजह परेशान करत हो स्वामी का....फिर सब हंस पड़े.
लेकिन एक बात कहूँ अम्मा..क्या मोटे?
ई ससुर स्वामी जब देशी पी लेत है तो किसी हिजड़े से कम नाहीं लागत....
चुप रह मोटे अब तो हम अंग्रेजी दारू पिता हूँ, ऊ का नाम है उसका..हाँ जिसमें चिड़िया बनी है बोतल पर....ससुर किंगफिशर.
हाँ अब तो तू सही में अंग्रेजी होइए गए हो भाई.....पूराने थकी आवाज में बोला.
(4)
हिजड़े उतरे नहीं की अगले स्टेशन पर कुछ झोला छाप बिक्रेता चढ़ गए.....
लीजिये १० रुपये में १० सामान...कंपनी का प्रचार है ...मुफ्त में सामान है
१० रुपये का टोकन है ...नंबर लगा तो १०० भी बन सकता है ....मौका मत जाने दीजिये...
का हो ई का १० रुपये में १०० ...सही कहत हो या चूतिया बनावत हो...पूराने की आवाज थी
१० रुपये टोकन १०० रुपये कमाए..जल्दी करिए ..अगले स्टेशन पर डिब्बा बदल देंगे ......
का अम्मा लगा दी १० का नोट...देखा जाई जोन होई...हम नाई जानित तू देख ले अपना पूराने....
अच्छा....भाई ये लो १० का नोट और टोकन दो....
अगले पल बिक्रेता ने टोकेन थमाये...पूराने चिल्ला पड़ा १०० लगा...लपक के १०० का नोट पकड़ा और जेब में डाल लिया.
अब और लोगों से रहा ना गाया..उसमें पूराने फिर से था.
सब ने १० रूपये का टोकन लिया पर इस बार पूराने ने १०० रुपये का.
नोट थमा कर सब बिक्रेता का मुहं देखने लगे.........सबके हाथ में अब टोकन था....
का हो स्वामी तहार लाग की नहीं..और मोटे तहार..
नहीं हमरो तो नाहीं लाग..अम्मा बोली.....
पूराने तहार...ससुर अबकी तो दसो टोकन खली है
लागत है अबकी सबका खाली है....हाँ जान तो यही पडत है.
धत तेरी की लूट लिहिस हम सब का...१०० मिला रहा वहो गाया, १० अलग से...
अगले पल सब चुप मार के बैठ गए और एक दूसरे का मुहं देखने लगे.
Conti...
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Friday, April 16, 2010

रेलगाड़ी की यात्रा ...(हास्य)

मुझे तो लगता है जिंदगी ही हास्य के लतीफों से भरी पड़ी है. जरुरत सिर्फ उसको समझने की है.
चलिए मैं आपको रेलगाड़ी की यात्रा कराता हूँ जिसमें आपको तरह-तरह के लोग मिलेगें और उनकी बातें किसी हास्य कवी की रचना से कम ना होगा...............
पहला चरित्र मोटे लाल--नाम मोटे लाल पर शरीर ऐसा की कोई भी उठा कर उन्हें खूंटी पर टांग दे
दूसरा चरित्र स्वामी नाथ--सिर्फ शराब और जुएँ का स्वामी
तीसरा चरित्र संगमलाल की अम्मा--नाम मुझे भी नहीं पता, असली नाम लोग भूल चुके थे
इस डिब्बे का चौथा और आखरी चरित्र पूराने--असली नाम जीतेन्द्र पर हाव-भाव पूराने होने के कारण, नाम पूराने पड़ गाया
(सावधान टिकट सिर्फ साधरण डिब्बे का मिला था, इसलिए मेरी सोच भी इन साधारण लोगों के आस पास ही भटक रही है)
रेलगाड़ी ने रेलवे स्टेशन छोड़ा ही था की इन लोगों की बातें शुरु हो गयी
(1)
अम्मा एक बात बोलूं, हाँ बोल स्वामी
रेल गाड़ी से अच्छा बस होत है
काहे स्वामी....
ई ससुर अगर कहीं लड़ जात तो एक माहीना उठावे मां लाग जात
लकिन अगर बस लड्त है, जुरतये क्रेन से उड़ जात
अब स्वामी तू चुप रहबो की नहीं, नाहक काहे लडावा चाहत हो रेलगाड़ी; मोटे लाल कुछ हलके अंदाज में बोला....
इतने में ट्रेन रुक गयी....
स्वामी फिर बोला, ये ट्रेन काहे रुक गयी ?
पूराने टपाक से बोला, लग रहा है ट्रेन का टायर पंचर हो गाया....
सही कहत हो पूराने, ई ससुर जब देखो तब रुक जात है...
वैसे एक बात है पूराने, कौउन सी बात...
इस बार हमार तो पूरा पैसा वसूल है, पिछली बार दुसरकी वाली गाड़ी तो बहुत जल्दी पंहुचा दिस रहा पर अबकी तो खुब आराम से चलत है, पैसा वसूल है खुब देर तक बैठेका मिली.
ई मोटे काफी देर से चुप है....अम्मा बोली
काहे कवनो परेशानी....हमार जोन मन करी हम वही करब....
गुस्सात काहे हो, पान खाबो....अच्छा लाओ तमाखू वाला है?
जानत हो, ई पान हमरे दूकान का है, पूरा खर्चा चलावत है ई पान हमरे घर का
अम्मा लकिन पान मस्त है.....
(2)
चाय वाले का प्रवेश हुआ डिब्बे में.........
चाय, चाय गरम......दो रुपये की मस्त चाय
सब एक चम्मच चीनी डारत हैं, हम दो मजा आ गाया
सब एक कप दूध डारत हैं, हम दो मजा आ गाया
सब फूँक के चाय की पत्ती डारत हैं हम दिल से, मजा आ गाया
तब तक मोटे से रहा नहीं गाया, बोल पड़ा..................
सब एक कप पानी डारत हैं, तुम १० मजा आ गाया
सही कहत हो मोटे, ससुर ने पिछली बार मुझे पानी पिला दिय
पूराने सबको चूतिया बनाता है इसने पूराने को बना दिया...........
एक बात है पूराने, का मोटे......
चाय तो आपन घर कय ही मजेदार होत है, पूरे दूध की चाय बनत है हमरे घर
मोटे ऊ तहार भैंस बच्चा दे दिहिस का....हाँ एक माहीना होत है
लकिन अबकी किस्मत साथ ना दिहिस....काहे
बछवा बियान, बछिया होत तो दो साल बाद बेंच देतन..
तौ इसमें किस्मत का काहे कोसत, ई तहार मर्जी तो रही नहीं
(लिखने को तो बहुत है लकिन आज इतना ही काफी)
Contiu...
तेज प्रताप सिंह `तेज´

शौचालय का दर्द (हास्य)..............

एक दिन शौचालय भी हंस कर बोल पड़ा
मैं तो एक हूँ पर लोग क्यों अनेक हैं 
किसी का मोटा, किसी का पतला 
कोई गोरा तो कोई काला................
सब अपनी तशरीफ़ रखते हैं 
खुद तो पकवान खाते हैं 
मुझे सडा-गला बचा हुआ खिलाते हैं
हर दिन कुछ नया मिलता है 
कभी सानिया-मलिक के निकाह
के खाने की खुसबू मिलती .......
तो कभी आयशा सिद्दीक़ी के 
तलाक के बाद का लिया गया निवाला
राजनीतिक खुसबू की तो बात ही निराली
संसद के अन्दर-बाहर जितनी भी रोटियां पकती
देर-सबेर हमें उसकी खुसबू मिल ही जाती 
राहुल और माया के तशरीफ़ का स्वाद भी मिलता
पर दलित तडके के कारण एक जैसा ही लगता 
फ़िल्मी सितारों की महक आज-कल थोडा सड़ी है 
क्योंकि आईपीएल से बॉक्स ऑफिस की हवा उडी है 
बाबा राम देव ने लगता है कुछ खाया नहीं 
योग शक्ति के डर से कुछ भी बाहर आया नहीं
शशि थरूर ना अपना हाजमा खुद खराब किया 
जो बिना हाजमोले के मोदी से दो-दो हाथ किया
अमर तो लखनऊ में मेरा दरवाजा ही खोलना भूल गए
दिल्ली में रहते हैं हमेशा जमें जबसे मुलायम से दूर गए
राज ठाकरे जब कभी मौसम बे मौसम आते हैं
तो हमेशा मराठी मानुस की याद दिलाते हैं
कवी महोदय तो अब आते नहीं 
लगता है वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के 
चक्कर में कुछ खाते नहीं......

(बाकी कल)
तेज प्रताप सिंह 'तेज'

Thursday, April 15, 2010

घिस रही है उधडे रंग के टूटे धागों में..........

कोठे(चकला) की दीवारों पर लटकता पर्दा
सामने पड़ी लाल रंग की चटाई
याद दिला रही हैं उसको अपने
बीते कल की जुदाई.....
वही रंग है दोनों का जो कभी
देखा था उसने अपने गाँव
के बने घर में......
ढलता जा रहा है उसका भी रंग धीरे-धीरे
लटकते पर्दों के साथ.....
घिस रही है उधडे रंग के
टूटे धागों में......
पहले मन अब तन भी हुआ बेरंग
धीरे-धीरे फूल सा चेहरा
बदल गाया बेल के काँटों में....
उड़ते लाल रंग को देखकर 
मन में हर बार वह यही सोचती
इस बार की बोली गाँव में लगी बोली से
थोडा और है कम ......

Wednesday, April 14, 2010

सिन्दूर की अभी भी है कमी............

उँगलियों से टटोलती मांग को अपने 
सर पर रखकर हाथ सोंचती 
सिन्दूर की अभी भी है कमी....
निहारती दर्पण को एक टक
फिर रो पड़ती सहसा.....
धूमिल हो जाते सपने आँखों से गिरते 
बूंदों के बदल से.....
कोई ना आया पकड़ने उसका हाथ 
और ना ही पोंछा आसुओं भरी बरसात 
अब तो घर में भी है वह बोझ  
ताने है की पीछा नहीं छोड़ते 
मर जाती तो अच्छा होता...
जाये भी तो कहाँ जाये वह 
किसे पुकारे सुनाये अपना दर्द 
जब घर वाले ही हो गए बेदर्द 
किया क्या है उसने 
शिर्फ एक दाग ही तो सफ़ेद है 
चेहरे पर उसके.....

Monday, April 12, 2010

खड़ी दोपहरी में देखा था उसको छत पर......

खड़ी दोपहरी में देखा था 
उसको छत पर......
अम्बार दुःख का झूल रहा था
आँखों में उसके.....
एक हाथ में पानी का कटोरा  
दूसरे में उल्झी-अधूरी लकीरें 
तन काला कि जैसे सारी धूप 
सोख ली हो उसने.....
हाथ-पैर शमसान की लकड़ी की 
तरह जल रहे थे....
वस्त्र के नाम आधे तन पर फटा हुआ 
जूट का बोरा था...
जिससे वह रह-रह कर पसीना 
पोंछ रही थी.....  
बालों में मिट्टी का लेप 
जगह-जगह ठसा था....
एक पैर छत पर तो दूसरा दिवार पर 
नंगे टिका था....
लोग नीचे से पत्थर मारते तो वह पकड़ कर 
कटोरे में रख लेती...
बोलती मैं नहीं तुम लोग पागल हो जो खड़ी 
दोपहरी में पत्थर मार रहे हो ......

Friday, April 9, 2010

विधवा-शहीद

सफेद वस्त्रों में लिपट गयी 
छोड़ कर जीवन के रंग 
एक ही सवाल है बस मन में 
क्यों गए मेरे पिया छोड़ मेरा संग 
रात होती थी पहले दिन के बाद 
अब तो दिन भी लगते हैं रात 
इंतज़ार का दुःख भी खत्म हुआ 
बचा शेष तो सिर्फ अवसाद 

जननी को समर्पित मेरा यह प्यार 
याद दिलाएगा शादियों तक बार-बार 
गर्व से मैं भी कहूँगी आज से.....
विधवा-शहीद कप्तान हरदीप सरदार 
किसने दिया यह नाम नक्सलवाद 
जो धीरे-धीरे बनता जा रहा आतंकवाद
उखाड़ो इसे कहीं निगल ना ले ये 
एक और दांतेवाड़ा जवान कप्तान 



Sunday, April 4, 2010

ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ.......

निंद्रा नहीं स्वप्न मांगता हूँ 
कभी ना बीते वो रात मांगता हूँ 
आकर जो पोंछ जाये मेरी आँखों से आंसू,
ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ.......

लिख गाया अपनी मुस्कुराहट से 
इस शीशे-दिल पर अपना नाम 
कि टूटा तो भी मुस्कुराया 
हर टुकड़ा लेकर उसका ही नाम
आज फिर है गुजारिश..............
दर्द नहीं प्यार मांगता हूँ 
कभी ना कम हो वो एहसास मांगता हूँ 
आकर जो जोड़ दे मेरे टूटे शीशे-दिल को,
ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ....... 

इंतज़ार नहीं साथ मांगता हूँ 
हाथ के लकीरों का अंजाम मांगता हूँ
आकर जो कोई थाम ले मेरा हाथ, 
ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ.......

Saturday, March 27, 2010

तुम्ही निकले ...........

सुख चैन छीन कर कहते हो 
सजा तो नहीं है
जलाकर कपूर कहते हो 
राख तो नहीं है 
जाऊं भी तुम्हे छोड़ कर तो कहाँ जाऊं 
मंदिर, मस्जिद और भगवान भी तुम्ही निकले 

अधर चुम्बन देकर कहते हो 
बेशर्मी तो नहीं है 
तीर धनुष से छोड़ कर कहते हो
मृग तो नहीं है 
घायल होने से रोकें तो कैसे रोकें दिल को 
आखेट, आखेटक और सारथी भी तुम्ही निकले 

हाथ दिल पर रखकर कहते हो 
धड़कन तो नहीं है 
भाव इश्क का लगा कर कहते हो
सस्ता तो नहीं है 
बिकने से रोकें दिल को तो कैसे रोंकें
दूकान, मालिक और खरीदार भी तुम्ही निकले

Thursday, March 25, 2010

धीरे-धीरे चल....जिंदगी को जी......

भाग रहा है इन्सान 
दौड़ रहा है अनचाहे सपनों के सड़क पर 
कभी दायें तो कभी बायें मुड़ता
फिर भी नहीं पहुँचता मंजिल पर 
सबको पीछे छोड़ने कि ठसक 
सबसे आगे दिखने कि जिद
में क्यों है तैयार बिकने को 
खो गाया है तू कहीं इन्सान
क्या हो गया है तुझे!! ....
खोज रहा है गेहूं भूसे में
पानी में चला रहा है तलवार
थोडा तो बदल गाया इन्सान
वो दिन ना आये जब तू थक जाये 
रिश्ते भी दामन छोड़ दें....
अकेला पड़ जाये और रास्ते भी बंद हों 
मन को थाम ले अभी भी है समय 
धीरे-धीरे चल
जिंदगी को जी.....

Saturday, March 20, 2010

नेता तुम लूट लो............

आम आदमी की आस 
बड़े वादों का झूठा विस्वास 
भावनाओ का ब्रत उपवास 
लूट लो दोनों हाथों से लूट लो 
नेता तुम लूट लो............
चुनाव आते हैं  बार-बार 
नयी आस और उम्मीद के साथ 
कर दिए जाते हैं फिर वही वादे 
जिनपर इरादे थे सफ़ेद और सादे 
क्यों करते हो वादे 
जो करना है कर लो 
नेता तुम लूट लो............
सम्माननीय भारतीय सविंधान
लोकतंत्र  और उसकी लाज की 
बारी-बारी से संसद में लगाओ बोली 
आज ही मोल कर खरीद लो
नेता तुम लूट लो............






 

Wednesday, March 17, 2010

"युवाओं से है मेरी पुकार...सरदार भगत सिंह की कुछ पक्तियों से...."

आज आप को मैं कुछ उन पक्तियों से परिचय कराता हूँ जब सरदार भगत सिंह जेल में अपनी मंगेतर के याद में गाया करते थे.

आजीवन तेरे फिराक जुदाई विछोट्र,
विरह, नामिलन के कारण 
दिल का शीशा इतना कमजोर हो गया कि 
किसी फूल पत्ती या पराग कि चोट से टूट ना जाये, 
इसलिए ये फूल पत्ती और पराग धीरे-धीरे धीमे-धीमे चढ़ा. 

इन पक्तिओं को पढने के बाद मैं लिखे बिना रुक ना पाया 

आजीवन जिसने सहा फिराक जुदाई विछोट्र,
विरह और  नामिलन......
फिर भी किया नहीं उफ भी एक पल 
सतत लड़ा आजादी का सपूत 
रक्त का हर एक बूँद बहाकर

युवाओं से है मेरी पुकार 
बना लो ऐसी एक मजबूत कतार
तोड़ ना सके जिसे कोई.....
धर्मं, भ्रस्टाचार और आतंकवाद   
अब ना करो और जादा देर
कहीं हो ना जाये शीशे जितना कमजोर 
मेरा यह देश.....
जिसपर हम चढ़ा ना सकें फूल, पत्ती और पराग 

टी पी सिंह 
(चित्र साभार गूगल)