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Wednesday, December 30, 2009

जिंदगी....

सभी अपनी जिंदगी को इसी उम्मीद के साथ जीते हैं की कभी न कभी वो दिन ज़रूर आएगा जब उनके मन की हर इच्छा पूरी होगी............
शाम का समय था सूरज की लालिमा अपने घर वापस जा रही थी और उसी के साथ-साथ मैं भी, तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी सर...मैं रुक गया और पीछे मुड़ा तो देखा मेरे ही उम्र का एक छोटे कद का लड़का जिसके पास एक काले रंग का झोला था जिसे उसने अपने लम्बे सीने के छोटे कंधे पर लटका रक्खा था.
मैंने जवाब दिया ....
नमस्ते, आप कौन?
सर आप ने मुझे पहचाना नहीं, मैं आप का जूनियर....
दीपक तुम! काफी बदल गए हो पहचान नहीं पाया, यहाँ कैसे?
सर मुझे यहाँ दिल्ली में जॉब मिल गयी है...
कहाँ ज्वाइन किया?
मेट्रो रेल कॉरपोरेशन मैं एस अ टेक्नीकल इंजिनियर
बधाई हो भाई,
सर मैं शादी कर रहा हूँ, उसी का कार्ड देने आया हूँ
अरे वाह भाई! डबल बधाई, कब है शादी
१५ जुलाई को आना ज़रूर सर,
बिलकुल क्यों नहीं, शादी कहाँ कानपुर से कर रहे हो,
सर! आप को तो सब पता है लेकिन उनके घर वालों को मनाने मैं काफी मेहनत करनी पड़ी

चलो एक बार फिर बधाई.......
अगले दिन जब में लैब मैं पहुंचा तो रोज की तरह सर्वेश जी के साथ चाय पीने चला गया
एक चाय मेरे लिये भी बोल देना
दो चाय देना....जी!
सर्वेश जी मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिये, सर दे देंगे क्या?
कहाँ जाना है, देख ले आज कल सर थोड़ा मूड मैं नही हैं
पूछता हूँ देखो क्या कहते हैं
पर जाना कहाँ है....
एक दोस्त की शादी है कानपुर में,
क्या बात है आज कल खुब मस्ती हो रही है;
अच्छा दोस्त है.......
चल भाई लैब मैं चलते हैं, मुझे कुछ काम है....
लैब के अंदर जाते ही मैंने देखा की सर अपनी बेटी से फ़ोन पर बात कर रहे थे और बहुत खुश नजर आ रहे थे. सर से छुट्टी मांगने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं होता था, मैं उनके फ़ोन रखने का इंतज़ार करता रहा और जैसे सर ने फ़ोन रखा मैं झट से उनके पास पहुँच गया. अब क्या था मेरे कहने की देर थी की सर ने हाँ बोल दी. मैं बहुत खुश हुआ और सर को थैंक्स बोल कर वापस आ गया. तब तक सर्वेश जी भी आ गए.
सर्वेश जी मिल गयी छुट्टी मुझे सर ने हाँ कह दिया,
जा भाई सर तेरे पर तो कुछ जादा ही महेरबान हैं...
मुझे भी यही लग रहा है, उम्मीद नहीं थी
फिर मैंने सोचा की लाओ ज्योत्सना जी को भी लगे हाथ छुट्टी के बारे में बता देते हैं, मैंने अपनी नजर इधर उधर घुमाई और उनको उसी कुर्सी पर बैठे हुए पाया जहाँ वो अक्सर बैठा करती थीं. फिर मैंने सर की तरफ देखा और फिर घडी के....बस अब उनके जाने में ५ मिनट बचा है....जैसे ही सर गए मैं तुरंत ही ज्योत्सना जी के बगल वाली कुर्सी पर जा कर बैठ गया. शायद आज ही ज्योत्सना ने अपना डेस्कटॉप इमेज बदला था.

ये क्या लगा रक्खा है डेस्कटॉप पर गोल सा.....
पता है जिंदगी भी इसी तरह गोल है,
ऐसी बात नहीं है, जिंदगी अच्छी है,
बशर्ते आप उसे सकारात्मक लें......
मुझे आप से एक बात बोलनी थी,
क्या?
मैं दो दिन के लिए घर जा रहा हूँ
सर से पूछा है या नहीं...पूछ लो पहले
हाँ पूछा, सर ने हाँ कह दी.....
ठीक है जल्दी आना iNOS वाला काम भी खत्म करना है,
और यह बता कर मैं अपनी टेबल पर या ऐसा कहो की सर के बाँटने के बाद बची कुची टेबल पर जो सर्वेश जी के कहने से थोड़ा बड़ी हो गयी थी उस पर काम करने चला गया, इतने में शिल्पी जी भी अपने टेबल पर काम करने आ गयीं जो की मेरे ठीक सामने ही थी...बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा....
आप को लखनऊ से कुछ मंगाना है क्या?
कब जा रहे हो
कल
हाँ वहां चिकन की साड़ी अच्छी मिलती है पर मुझे कुछ मंगाना नहीं है,
ठीक है बाद में कुछ मत कहना....






ट्रेन से सफ़र करते समय मेरी कुछ न कुछ लिखते रहने की आदत थी.......

"हैरान हूँ मैं शब्द की मार से.....
तोड़ता हूँ मरोड़ता हूँ शब्द को,
शब्द की राह और उसकी शाज को!
निकालता हूँ और सुनता हूँ शब्द को,
बिखेरता हूँ और पकड़ता हूँ शब्द को..
शब्द ही बनाते हैं धुन और सरगम,
जोड़ते और तोड़ते भी हैं दिल! ये शब्द ...
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से....."

कानपुर आने के इंतज़ार में कुछ इस तरह मैंने समय को अपने साथ-साथ चलने दिया और बार-बार खिड़की से बहर देखता रहा. कानपुर आते ही मेरे पैर सीधे २३-शादी घर स्टेशन रोड की तरफ चल दिए जो की स्टेशन से मुश्किल से आधा किलोमीटर की दूरी पर था. शादी घर पंहुचा तो देखा बहुत अंधेरा था वहां, मैंने किसी से पूछा......भाई साहब शादी घर यही है
हाँ ठीक जगह पर आये हैं आप, दीपक की शादी मैं आये हैं क्या?
हाँ..
चलिए अंदर चलिए मैं उनका चाचा हूँ, लाइट चली गयी है बस अभी आती ही होगी....
तब तक कहीं से आवाज़ आई....
अरे तेज सर आप कब आये..
अभी-अभी पहुंचा हूँ, इतनी देर मैं लाइट भी आ गयी,
इन लोगों से मिलये ये सब मेरे दोस्त हैं अब आप को इन्ही के साथ गप्पे सप्पे करनी हैं मैं तो २ बजे के बाद ही आप को मिलुंगा.....
जा भाई तू तो आज दूल्हा है और हम बाराती, मिलते हैं २ बजे के बाद.....
सब के साथ खाना खाया और उसकी शादी को देखता रहा

काफी रोमांचित कर देने वाले छड़ थे वो.........!!!!!
मैंने घड़ी देखी २ बज कर १५ मिनट हुए थे की दीपक ने अपने आने का वादा पूरा किया
उसने सबको अपनी तरफ बुला लिया और बोला की अब तेज सर हम लोगों को कुछ सुनाने जा रहे हैं, मैं बोला क्या यार गाना वाना मुझे नहीं आता....
सर मैं तो आप की लिखी हुई कुछ लाइनें सुनना चाहता हूँ
अरे यार यहाँ, तब तक सभी लोगों ने दीपक की हाँ में हाँ मिला दिया और मैं मना न कर सका....

"सावन को आने दो पूछेंगे उससे,
क्या तुम्हें मेरे दर्द का ख्याल न रहा.......
वो भी पल थे जब वो साथ थे तुम साथ थे,
सारे लमहे अपने थे उनकी हर बात महकती थी,
हवा भी उनके साथ चलती थी,
और तुम ही इशारे से उनके आने की खबर दिया करते थे...
आज न ही वो लमहे अपने रहे;
न ही तुमने उनके आने की खबर दी.....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!"
सर एक और.....................

सांसे गहरी, दिल प्यासा और मन उदास है,
...सब कुछ होने के बाद भी!!
अब ना होगी इन आँखों में इंतज़ार की कहानी,
और ना ही होगी मुस्कराहट में इकरार की कहानी,
दब जाया करेंगी मेरी ऑंखें आसुओं के साथ.....
जब मैं देखूँगा अपने हाथों की इन लकीरों को,
और खोजूंगा उनके आने की खबर....

बस भाई इससे जादा अब मैं नहीं सुना सकता.........................
अब मुझे नींद रही है मैं तो सोने जा रहा हूँ.............
सुबह हुई तो देखा शादी की सजावट को इसतरह से हटाया जा रहा था जैसे विधवा की मांग से सिंदूर, कुछ भी नहीं बचा थासिवाए जूठे पड़े प्लास्टिक के ग्लास और उनके साथ पेप्सी की बोतलों के. गली के कुत्तों को तो जैसे महीने भर का खाना एकसाथ ही मिल गया हो. मैंने नाश्ता किया, दीपक को शादी की बधाई दी और चंपत हो बना. शादी के बाद जितना जल्दी होउतना जल्दी निकल लेना चाहिए नहीं तो कुछ देर बाद लोग पहचानना ही बंद कर देते हैं.................








अगर कहीं आप भूल से भी सुबह :१५ पर आइ. जी. आइ. बी. पहुँच जाएं तो सर आप को लिफ्ट के पास ही मिल जाएँगेऔर पूरी राम कहानी लिफ्ट के अंदर ही हो जायेगी. उस दिन वापस लौटने पर मेरे साथ यही हुआ, सारी राम कहानी कब, किसको, कहाँ, कौन, क्यों ........मैं लिफ्ट के एक कोने मैं खड़े होकर उनके हर बात का जवाब देता चला गया. अचानकलिफ्ट खुली और हम लिफ्ट से बाहर गए फिर वो अपने रास्ते मैं अपने ऐसा लग रहा था जैसे हम पहली बार मिलें हों.
गया तू वापस शादी कैसी रही...
हाँ सर, मस्त थी! चाय पीने चलना है
चल चलते हैं...
दूसरे दिन: मैं लैब में काम कर रहा था दिन के बजे थे की अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी....
दीपक कॉलिंग....
हेलो! हाँ कैसा है तू,
सर मैं कल दिल्ली रहा हूँ...
इतनी जल्दी अभी तो दो दिन ही हुए हैं तेरी शादी को,
हाँ वो तो ठीक है पर छुट्टी जादा नहीं मिली थी..
ओके दिल्ली पहुँचना तो एक बार और फ़ोन कर लेना फिर पार्टी करते हैं...
बिलकुल सर...बाय
अगले दिन सर लैब में नहीं थे और ऐसा लग रह था की आज सबके पर निकल आये हों, सभी अपनी मर्ज़ी वाले काम कर रहेथे सिवाए राज शेख़र के कोंय्की वो तो रोज ही अपनी मर्ज़ी वाले काम करता था. राजन को तो जैसे दुनिया से कोई मतलबही नहीं था पर जब सनोबर का नाम आता था तो थोड़ा खुश हो जाता था. अमरेन्द्र रोज की तरह उस दिन भी किसी कोगिफ्ट देने की तैयारी में था, करता भी क्या गिफ्ट से ही अपना काम चला लिया करता था. एक तरफ जीतेन्द्र पी. सी. आर. लगा रहा था और शिल्पी जी उनके बगल मैं खड़ी थीं, ये भाई साहब भी सर के रहने पर ही नजर आते थे. अमित औरममता जी इन सब मौकों पर देर मैं आया करते थे. ज्योत्सना उस दिन फैअक्स रूम मैं काम कर रही थीं, शायद वहां जादाशान्ती होती थी. मैं उनके कोम्पुटर पर काफ़ी विथ किशोर का मजा ले रहा था.
जिंदगी एक सफ़र है सुहाना, कल क्या हो किसने जाना.........

सभी अपने लय मैं खोये हुए थे की इतने मैं सर्वेश जी का लैब में प्रवेश हुआ......
क्या हो रहा है कुछ बाहर की भी खबर है...अगली साँस लिए बिना बोले एन डी टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ रही है, चांदनीचौक मैं बम ब्लास्ट हो गया...पहले तो किसी को कुछ समझ में नहीं आया पर अगले ही पल सभी ने सर्वेश को घेर लिया औरपूछने लगे...
क्या हुआ क्या हुआ !...डिटेल
में बताओ...
हे! भगवान ये क्या हो गया..
कितने लोग मरे?
ये तो पता नहीं पर काफी लोग मरे हैं,
पता नहीं ये सब कोन करता है, क्या मिलता है उन्हें...
मेरी तो जैसे सांसे ही रुक गयी हों. ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे एक बड़ा सा पत्थर दे मारा हो. कब क्या हो जय किसी कोकुछ पता नहीं....सभी अपने जगह पर दोबारा चले गए पर १५ मिनट पहले वाली खुशी जाती रही......
रात भर मुझे नींद नहीं आई. सुबह होते ही सबसे पहले अखबार को उठाया.....
दिल्ली दहली ९८ मरे १०० से जादा घायल....
हर जगह लाशें और खून लेकिन प्रशासन को कोई फ़िक्र नहीं
मेरे पैर के नीचे से धरती तब फिसली जब मेरी नजर दूसरे पेज पर छपी फोटो पर पड़ी....
अरे ये तो दीपक है..ऐसा नहीं हो सकता. मैंने मोबाइल से उसके शादी की ली गयी फोटो से उसका फोटो मिलाया....
शक यकीन में बदल गया. मेरे हात पैर कांपने लगे
किसी तरह से दीपक का फ़ोन नंबर खोजा..
पता नहीं मिलेगा भी या नहीं, चलो कोशिस करके देखते हैं...
हेलो!! दूसरे तरह से एक बहुत ही दुखी और गंभीर आवाज़ आई...
आप कौन..
मैं प्रदीप...
थोड़ा रुकते हुए मैंने पूछा.. दीपक?
आपने ब्लास्ट के बारे में तो सुना ही होगा, वह......

मैंने तुरन्त उसका पता नोट किया और उसके घर जाने के लिए ऑटो बुलाया....
ऑटो रुकते ही सबसे पहले दीपक के नंबर पर फ़ोन किया..
आप कहाँ हैं..अच्छा मैं रहा हूँ आप वहीँ रुकिए,
उसके घर जाकर देखा की सभी कानपुर जाने की तैयारी में थे. सभी में दीपक की पत्नी शबीना भी थी. एक ही बार मिला थामैं..मुस्लिम होते हुए भी उसने हिन्दू लड़के से सदी की, कम ही लोग कर पाते हैं ऐसा प्यार जैसा दीपक-शबीना ने किया परअब सब कुछ बिखर गया था. ना भगवान का दया आई ना ही ख़ुदा को...क्यों किया ऐसा इसका जवाब किसी के पास नहींथा. किसी को मैंने यह कहते हुए भी सुना..मुस्लिम से शादी की थी नतीजा सामने है... मेरा दिल चीख-चीख कर यही कहरह था, क्यों दो प्यार करने वाले नहीं मिल पाए...आदमी से गुनाह होते देखा था पर आज तो भगवान से भी गुनाह हुआ है.

मुंह मोड़ लिया मेरी जिंदगी से,
बुझ गया मेरे जीवन का दीपक!
छोड़ दिया मुझे अकेले, मैं कैसे जिंयुंगी तेरे बिना..
किसे कहुँगी अपना, कौन होगा मेरा....

कुछ ऐसा ही शबीना सोच रही होगी...
सबके चले जाने के बाद मैं भी सीधे लैब चला आया. धीरे-धीरे समय ने रफ़्तार पकड़ ली.....
खोने को तो इस जिंदगी मैं बहुत कुछ होता है पर पाने की लिए बहुत कम फिर दिल क्यों भागता रहता है अंजान रास्तों पर. कोई नहीं जनता और ना ही जानने की कोशिश करता है.......



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